शिवशंकर भेड़िअहा

आधा घंटा व्यतीत करता हूं शाम के भ्रमण में शिवशंकर भेड़िअहा (भेड़ चराने वाला) के समीप. इस दौरान वह बात भी करता है और नजर अपनी भेड़ों पर भी रखता है.


भेड़ चराता है वह. उसके अनुसार उसके पास सत्तर भेड़ें हैं. अगियाबीर के पठार पर दो बीघा जमीन भी है. उसमें से आधी ही खेती के काम की है. खेती करने के लिए उसने एक जोड़ी बैल भी रखा है. बैल बूढ़े हो गए हैं, पर उनको रखे हुए है – “कसाई को देने का मन नहीं होता”.

पूछने पर वह बताता है – भेड़ें गाभिन हों तो छह हजार तक की बिक जाती हैं. कसाई तो तीन हजार में लेता है. दस महीने में तैयार हो जाते हैं पशु बेचने के लिए.

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दोपहर में द्वरिकापुर में गंगा किनारे


सवेरे निकलता हूं घूमने। गंगा तट पर जाना होता है तो उसी समय। अब सर्दी बढ़ गयी थी। सवेरे की बजाय सोचा दिन निकलने पर निकला जाये। बटोही (साइकिल) ने भी हामी भरी। राजन भाई भी साथ निकले पर वे अगियाबीर के टीले पर निकल गये; वहां प्राचीन सभ्यता के गहने-सेमीप्रेशस स्टोन्स के अनगढ़ टुकड़ों को बीनने। मैं अकेला गया गंगा तट पर।

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नीरव तो नहीं था वातावरण। गंगा का बहाव मन्थर था। जल कम हो रहा था। बीच में एक टापू उभर आया था और उसपर ढेरों प्रवासी पक्षी बैठे थे। शायद धूप सेंक रहे थे। मोटर बोट्स से उसपार से बालू ढोती नावें थीं। मेरे देखते देखते तीन नावें किनारे लगीं। उनपर सामान्य से कम बालू थी। हर नाव पर चार पांच कर्मी थे। वे नावों को किनारे लगा कर बेलचे से रेल तट पर फैंक रहे थे। कुछ तसले से भर भर कर तट पर ढो रहे थे। बालू का यह दृष्य देख मुझे हमेशा लगता है कि यह खनन अवैध है। इस बार भी लगा। पर मैं निश्चित नहीं था। हो सकता है कि यह सरकारी अनुमति के बाद हो रहा हो। पर मन में कोई न कोई भाव है जो गंगा के परिदृष्य से इस तरह की छेड़छाड़ को सही नहीं मानता – भले ही वह कानूनन सही हो। निर्माण कार्य में बालू का प्रयोग होता है। उत्तर प्रदेश सरकार की अवैध खनन पर कड़ाई के कारण बालू का रेट दुगना तिगुना हो गया है। असल में निर्माण कार्य में बालू का विकल्प आना चाहिये। नदियों का रेप कर निर्माण करना कोई अच्छी बात नहीं।

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खैर, बालू ढोने और उतारने का काम बड़े शान्त भाव से चल रहा था। मैं पीपल की जड़ को बेंच की तरह प्रयोग कर उसपर बैठा यह सब देख भी बड़े शान्त भाव से रहा था। अचानक एक गड़रिया करीब 50-60 भेड़ों के साथ गंगा तट पर उतरा। भेड़ों को उनकी भाषा में हर्र, हुट्ट, हेर्र,क्चक्च जैसे शब्द बोल कर स्टीयर कर रहा था। उसका सारा ध्यान और सम्प्रेषण सबसे आगे चलती भेड़ पर केन्द्रित था। उसके पास कोई कंकर या लकड़ी फेंक पर उसकी दिशा बदलता था। आगे वाली भेड़ को देख बाकी सभी “भेड़चाल” से निर्दिष्ट दिशा में चलने वाली थीं। … भेड़ों में कोई प्रयोगधर्मी या लीक से हट कर “जोनाथन लिविंगस्टन सीगल” की तरह की भेड़ मैने आज तक नहीं देखी। कभी किसी गड़रिये से पूछूंगा कि कोई मनमौजी स्वभाव की सामान्य से अलग प्रवृत्ति की भेड़ उनके पास है या थी!

गड़रिये को पानी पिलाने के लिये ज्यादा निर्देश नहीं देने पड़े भेड़ों को। शायद चरने के बीच में एक राउण्ड पानी पीना उनका नित्य का रुटीन होगा।

इक्का दुक्का लोग नहा कर लौट रहे थे। गंगा किनारे वह चबूतरा, जिसपर चौबेपुर की रिटायर्ड ब्राह्मण भाग्वत कथा कहते हैं और जहां कुछ भगवानजी के केलेण्डर और मिट्टी-पत्थर की भग्न, पुरानी मूर्तियां रखी हैं, पर रुक कर हाथ जोड़ आगे बढ़ जा रहे थे लोग। इतने में एक आदमी आ कर उस चबूतरे पर लेट गया। उसका पैर गंगा की ओर था और वह मनमौजी पन में अपनी दांयी टांग पर बायीं रखे हिला रहा था। पीपल की छाया से छन कर दोपहर की थोड़ी धूप उसपर पड़ रही होगी। धूप छांव का सही मिश्रण था उसके ऊपर। और पूरे वातावरण को वह एंज्वाय करता प्रतीत होता था।

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काफी समय हो गया था। घर पर लंच का समय। लौटने में भी मुझे 40 मिनट लगने थे। मैं उठ कर चला। एक बार दांये से बायें गंगा तट को निहारा। यह सब जाने कितनी बार कर चुका हूं और (लगता है) बाकी जिन्दगी यही करता रहूंगा।