#गांवकाचिठ्ठा – कल दिन की शुरुआत अच्छी थी, शाम तक खुशी गायब हो गयी

तुलसीपुर प्राइमरी स्कूल के क्वारेण्टाइन सेण्टर में बम्बई से आया एक परिवार रखा गया था। वह अवधि पूरा किये बिना घर चला गया और उसमें से एक बालक डायरिया से मर गया।” 😦


कल सवेरे मैं साइकिल पर घूमने निकला। नेशनल हाईवे 19 की सर्विस लेन पर महराजगंज से बाबूसराय के बीच मुझे कोई प्रवासी आता नजर नहीं आया। अन्यथा, हर सौ मीटर गुजरने पर कोई न कोई पैदल चलता नजर आता था। पैदल न हो तो कोई न कोई ट्रक या साइकिल गुजरती थी प्रवासी व्यक्ति(व्यक्तियों) के साथ। मैं शिवाला से भी गुजरा। उस समय वहां कोई नहीं था, सिवाय मोहित के डॉबरमैन कुकुर बड्डी के। फोन मिलाया तो मोहित ने बताया वह आधा घण्टा बाद आने वाल था।

सवेरे साढ़े छ बजे शिवाला परिसर। पेनोरामा चित्र। दायें किनारे पर शिव मंदिर है और बायें एनएच19 हाईवे।

दस बजे सवेरे शिवाला पर श्रमिकों के लिये चलते भण्डारे पर उपस्थित मोहित से फोन पर बात हुई तो पता चला कि श्रमिक गुजर ही नहीं रहे थे हाईवे पर।

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गांव के इन नौजवानों ने मेरा नजरिया बदलना शुरू कर दिया है

इन नौजवानों के चरित्र/व्यक्तित्व में बहुत सशक्त परिवर्तन हो रहे हैं। …
वे मानवता के देवदूत बन कर उभर रहे हैं!


गांव के लोगों को मैंने “बड़बोले, अकर्मण्य और निठल्ले” कहा। वह शायद शिवाला परिसर में कोरोनापलायन के पथिकों को भोजन कराने वाले इन नौजवानों को अच्छा नहीं लगा। कौन अपने गांव, मुहल्ले को खराब कहना अच्छा मानेगा? पर जब गांव की अधिकांश आबादी हाथ पर हाथ धरे बैठी हो और हैरान परेशान पथिकों को असंवेदना या हिकारत से निहारती हो, तब यह कहना ठीक ही है।

इन नौजवानों को लीक से हट कर काम करते और परोपकार की भावना से लबालब देखना अधिकांश गांव वालों को सुहा नहीं रहा – ऐसा मुझे बताया गया।

“इन लोगों का कुछ स्वार्थ होगा”, “जरूर पैसा बचा लेते होंगे”, “जब कोरोना पकड़ेगा, तब चेतेंगे ये”, “मूर्ख हैं” जैसे कथन इनके बारे में कह रहे हैं आमतौर पर गांव वाले।

पर कोरोनापलायन पथिकों को भोजन कराने, उनकी अन्य प्रकार से सहायता करने और उनके प्रति दयालुता का भाव रखने/दर्शाने से इन नौजवानों के चरित्र/व्यक्तित्व में बहुत सशक्त परिवर्तन हो रहे हैं। हम जैसे लोगों से जो थोड़ा बहुत प्रशंसा और उत्साहवर्धन मिलता है, वह इनके लिये टॉनिक का काम कर रहा है।

वे मानवता के देवदूत बन कर उभर रहे हैं!

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