प्रवासी मजदूर – मुख्यमंत्री की लताड़ से ही हरकत में आया प्रशासन

पिछले डेढ़ महीने से सड़कों पर आती भीड़ नहीं दिखी जिलाधीशों को? मानवता की “न भूतो न भविष्यति” वाली त्रासदी सड़कों पर लटपटाती डोलती रही और इन मित्रों को नजर नहीं आया?


कल सवेरे समाचारपत्र में था कि मुख्यमंत्री ने हिदायत दी है प्रदेश में आते ही प्रवासी श्रमिकों को पानी और भोजन दिया जाये। उनकी स्क्रीनिंग की जाये और उनको उनके गंतव्य तक पंहुचाने का इंतजाम किया जाये।

यह तो उन्होने परसों कहा होगा। कल इस कथन का असर नहीं था। मेरे सामने साइकिल से आये कई लोग अक्षयपात्र समूह द्वारा चलाये जा रहे भण्डारे में भोजन-विश्राम करते दिखे। दो पैदल चलते श्रमिकों को भी धीरज-राहुल ने बुलाया भोजन के लिये। कई ट्रकों में ठुंसे हुये लोग तो थे ही। कल जिला प्रशासन के अधीनस्थ अधिकारी और पुलीस की गाड़ियां आसपास से आये-गुजरे। कल तक तो मुख्यमंत्री के कथन का असर नजर नहीं आया था।

यह कल के भोजन वितरण का चित्र है –

लाइन में लगे, शिवाला पर अक्षयपात्र के कार्यकर्ताओं से भोजन ले रहे हैं प्रवासी

आज, जरूर अंतर नजर आया। सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान मेरे आठ किलोमीटर हाईवे पर आते जाते एक भी कोरोना-प्रवासी नजर नहीं आया – न पैदल, न साइकिल पर और न ट्रकों में। एक ट्रेलर पर कुछ लोग दिखे, पर वे शायद किसी जगह के निर्माण कर्मी थे।

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उन्होने लॉकडाउन में हजारों घर लौटते श्रमिकों को भोजन कराया

सुशील ने जितना बताया उससे यह तो स्पष्ट हुआ कि गांव में भी उत्साही और रचनात्मक लोगों की कमी नहीं है। वर्ना मेरा सोचना था कि यह गांव बड़बोले और अकर्मण्य निठल्लों का गांव है। गांव के प्रति मेरी धारणा बदल गयी।


वे सुशील हैं। सुशील कुमार मिश्र उर्फ बबलू। पास के गांव भगवानपुर में रहते हैं। उनके पिता राजनाथ मेरे अच्छे मित्र हैं। एक रात जया दुबे के घर बाटी भोज के दौरान वे भी आमंत्रित थे। भोजन के दौरान उन्होने बताया कि उन्होने और उनके मित्रों ने लॉकडाउन 1.0 में हाईवे के पास शिवाला पर दस दिन तक भण्डारा चलाया था। ध्येय था अपने घरों को लौटते श्रमिकों के लिये भोजन -पानी और कुछ आराम की सुविधा देना।

बाटी-भोज के अगले दिन मैं सुशील से मिलने गया उनके घर। लगभग आधा घण्टा उनसे चर्चा हुई। ज्यादातर सुशील ने ही बताया।

“फुफ्फा, लॉकडाउन होने पर पहले पहल जो लोग पैदल निकले वे बिना तैयारी के थे। उनके पास सामान नहीं था, खाने को भी नहीं। रास्ते में उन्हें ज्यादा सहायता भी नहीं मिल रही थी। हम लोग देखते थे उन लोगों को जाते। तब मन में आया कि इनके लिये कुछ करना चाहिये।”

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