हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 3)

सन 1948 का समय… राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का तीसरा भाग है।

भाग 2 से आगे –

सन 1948 में एक अत्यंत मेधावी विद्यार्थी और वाद-विवाद का वक्ता छात्र संघ का चुनाव हार गया। यह कहा जा रहा था कि विरोधी उम्मीदवार और उसके समर्थक यह फैला रहे थे कि एक “किताबी कीड़ा” विश्वविद्यालय प्रशासन का “चमचा” ही बन कर रहेगा और बहुसंख्यक विद्यार्थियों के हितों के लिये पर्याप्त आंदोलन नहीं करेगा। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था। नैतिकता का वलयाकार रास्ता नीचे की ओर फिसलने लगा था और “नेतागिरी” धीरे धीरे “गांधीगिरी” का स्थान लेती जा रही थी।

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