धनी कैसे व्यवहार करते हैं

आने वाले समय में जहां गंगा किनारे मड़ई में रहने वाले किसान और मछेरे की जिन्दगी के बारे में देखना, लिखना चाहूंगा, वैसे ही तिवारी जी और पाण्डेय जी जैसे लोगों को देखने, समझने और उनपर लिखने का अवसर भी तलाशता रहूंगा।



रिच डैड, पूअर डैड नामक पुस्तक ने धनी व्यक्तियों के जीवन और उनके मैनरिज्म हम मध्यवर्गीय लोगों की कल्पना में अधिक स्पष्टता के साथ ला दिये हैं। इसके साथ जब भी किसी धनी व्यक्ति को हम देखते हैं; विशेषत: धनी और सेल्फ मेड व्यक्ति; तो उसको बड़ी सूक्ष्मता से देखने का प्रयास करते हैं। … कम से कम मैं तो करता ही हूं।

सूर्या ट्रॉमा सेण्टर और अस्पताल की फार्मेसी में काउण्टर पर बैठे सूर्यमणि जी

पिछले दिनों दो ऐसे व्यक्तियों से मिलना हुआ। एक तो श्री सूर्यमणि तिवारी हैं। उनके बारे में विगत एक महीने में ब्लॉग पर कई बार लिखा भी है मैने। दूसरे मेरे समधी श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय जी हैं। पाण्डेय जी पांच बार लोक सभा सदस्य रह चुके हैं। इस बार वे खड़े नहीं हुये (क्षेत्रीय दल के साथ सीट समझौते के कारण पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया)। पर उनके व्यवसायिक और राजनैतिक समीकरण अभी भी पहले की तरह जीवन्त हैं। राजनैतिक परिदृष्य पर उन्हें स्पेण्ट-फोर्स मानने की भूल तो पार्टी (भाजपा) नहीं ही कर सकती। शायद वह उन्हें किसी और प्रकार से झारखण्ड के पोलिटिकल सीन में इस्तेमाल करने पर सोच रही है।

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लालती और पिताजी

यही कुछ क्षण हैं जो याद रहेंगे. अन्यथा वे कितना रिकवर करेंगे, कहा नहीं जा सकता.


पिताजी को तेइस दिन हो गए अस्पताल में. संक्रमण और वृद्धावस्था में डिमेंशिया के कारण अशक्तता उन्हें भ्रमित और लगभग कोमा जैसी दशा में होने को बाध्य करती है. कभी कभी वे “होश” में आते हैं. अन्यथा, बकौल डाक्टर साहब, उनका Glasgow Coma Score 9 के आसपास है. सामन्य व्यक्ति का 15 होता है.

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अतिवृष्टि की सुबह, अस्पताल में

क्वार महीने का आधा खतम हो रहा है. कल अमावस्या है. कल श्राद्ध पक्ष समाप्त हो जाएगा. परसों नवरात्र प्रारंभ होगा. पर इस समय इतनी तेज बारिश पहले किसी साल हुई हो, याद नहीं पड़ता….



आज रात भर बारिश होती रही. अस्पताल के कमरे में जब भी रात में नींद खुली, और साठ की उम्र पार करने के बाद ब्लैडर की क्षमता कम हो जाने के कारण ज्यादा ही खुलती है, तेज बारिश की आवाज और खिड़की से यदा कदा बिजली की चमक का एहसास होता रहा.

सवेरे उठने के बाद चाय का बहुत इंतजार करना पड़ा. घर में हमारे ड्राइवर साहब नहीं आए थे. घर से वही चाय ले कर आते हैं.

हमारा घर वहां ब्राह्मणों की बस्ती से अलग चमरौटी और पसियान के बीचों-बीच है. अशोक, ड्राइवर साहब ब्राह्मण बस्ती में रहते हैं. बारिश इतनी हो रही थी कि मेरे घर तक आने का साहस और मन ही न बना पाए वे.

बारिश में भीगता अस्पताल का गार्ड.

यहां सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में ऊपर बरसाती में कैंटीन है. मेरी पत्नीजी वहां भी हो कर आयीं. पता चला कि वहां दूध नहीं आया है. सो चाय नहीं बन सकती. बारिश में अस्पताल के बाहर किसी चाय की दुकान पर भीगते हुए जाने का साहस हममें नहीं था.

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आत्माराम तिवारी की अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में उड़द और गाय की चिंता

अशक्त, कूल्हे की हड्डी जोड़ने का ऑपरेशन कराए एमरजेंसी वार्ड में लेटे चौरासी वर्षीय पंडित आत्माराम तिवारी का मन गांव देहात, घर, उड़द और गाय में घूम रहा है. उन्हें एक बंधुआ श्रोता चाहिए पर लोग पगहा छुड़ा भागते हैं.



कूल्हे की हड्डी टूट गई है आत्माराम तिवारी जी की. उम्र भी चौरासी साल. सूर्या ट्रॉमा सेंटर के एमरजेंसी वार्ड में बिस्तर पर पड़े हैं. मेरे पिताजी के बगल में.

उनके साथ आए लोग तो उनकी उम्र 95 – 96 बताते हैं. पर उम्र इन्फ्लेट कर बताना तो इस इलाके की परम्परा है. वर्ना, उन्होंने खुद ही बताया कि सन 1995 में स्कूल मास्टरी से साठ साल की उम्र में रिटायर हुए थे. यूं चौरासी की उम्र भी कम नहीं होती. पर जो झांकी नब्बे पार का बताने में बनती है, वह ज्यादा सुकून दायक होती है. महिला की उम्र कम और वृद्ध की ज्यादा बताने की परम्परा शायद भारतीय ही नहीं, वैश्विक है.

खैर, उम्र की बात छोड़ आत्माराम जी के वर्तमान की बात की जाए. उनकी कूल्हे की हड्डी टूटी है पर वे पूरी तरह चैतन्य हैं. स्कूल मास्टर रह चुके हैं तो बोलने में उनका हाथ खुला है. पर्याप्त. लगभग अनवरत बोलते हैं.

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सूर्या ट्रॉमा सेंटर पर सोच – एक फुटकर पोस्ट

उसने बताया कि सुबह शाम कर्मचारियों के साथ वह बातचीत करता है. समझाता है कि कहां कौन सा disinfectant प्रयोग में लाना है. कहाँ सूखा और कहां गीला पोछा लगाना है. कर्मचारियों के साथ डांट और पुचकार दोनों का इस्तेमाल करता है. वह एक प्रकार से ऑन जॉब ट्रेनिंग दे रहा है कर्मचारियों को. दुर्गेश का जोश मुझे आशा वादी बनाता है.



मुझे अभी भी समझ नहीं आता कि सूर्य मणि जी ने इतनी उत्कृष्ट अस्पताल सुविधायें सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल, औराई जैसे ग्रामीण स्थान में क्यों प्लान की हैं. कमरों/वार्ड में सेरा और जाग्वार की फिटिंग्स हैं जब कि अधिकांश उपभोक्ता जनता अपने गांव और कस्बे के घरों में पाइप्ड पानी सप्लाई भी नहीं पाती.

अस्पताल के कमरे में W/C की सेरा और जगुआर की फिटिंग. इनसेट में श्री सूर्य मणि तिवारी

शायद गांव देहात के भविष्य की सोच उनके मन में है? अगर इस पूर्वांचल का विकास 7-8% की वार्षिक दर से हुआ तो बहुत संभव है हाईवे के साथ सटी पट्टी वैसे ही क्वॉसी-अर्बन हो जाए जैसे बड़ौदा – अहमदाबाद की पट्टी है.

पर फिलहाल तो इन सुविधाओं की वैसी दशा होने की आशंका है जैसी महामना और वन्दे भारत एक्सप्रेस की सुविधाओं की हुई थी. मरीजों और उनके तीमारदारी में आने वाले संबंधियों को अपना समान्य से बेहतर स्तर तो दिखाना ही होगा.

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उनके हाथ में स्वाद है – रामधारी यादव और संजय शुक्ला की केन्टीन

कुल मिला कर अच्छी और सस्ती सुविधा कही जाएगी यह कैंटीन और उसके अच्छे और जानदार घटक हैं संजय और यादव जी.



रामधारी सीनियर हैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर की केन्टीन में और संजय शुक्ला कुक हैं. उन दोनों की टीम 50 बिस्तर के इस अस्पताल के मरीजों, डाक्टरों और कर्मचारियों को भोजन देती है.

हमारा घर अस्पताल से पास में है – 10 किलोमीटर दूर. अस्पताल में हमारे लिए भोजन घर से ही आता है. फिर भी एक दो बार हमने कैंटीन का इस्तेमाल किया. और हमें सरप्राइज मिला. खाना अपेक्षा से ज्यादा घरेलू था और सुस्वादु भी. यह भी लगा कि उसका स्वाद मसालों के प्रयोग से नहीं, अन्न और सब्जियों की गुणवत्ता तथा बनाने वाले की कार्य कुशलता से उपजा है.

मेरी पत्नीजी ने कहा – खाना बनाने वाले के हाथ में स्वाद है.

केन्टीन के रसोईया, संजय शुक्ल

केन्टीन में नाश्ते और खाने की लिस्ट में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजनों की लिस्ट टंगी है. संजय ने बताया कि वह सब उपलब्ध कराने की योजना है. पर अभी मांग कम होने के कारण नाश्ते में केवल पूरी सब्जी और खाने में दाल चावल रोटी सब्जी बनता है.

“समोसा का इंतजाम करें और दिन भर में एक ही ग्राहक समोसे का मिले तो बहुत सामग्री बर्बाद होगी. इसलिए कुछ समय और देख कर आइटम बढ़ायेंगे.” – संजय ने बताया.

संजय कुक हैं और रामधारी यादव केन्टीन के कर्ता धर्ता. रामधारी घूम घूम कर ऑर्डर भी लेते हैं, लोगों को बताते भी हैं कि कैसे और कितने का काउंटर पर कूपन लेना है. रामधारी टफ लगते हैं, पर हैं रोचक व्यक्ति. मैं उनके पास 4 लंच का ऑर्डर देने गया. हम पति पत्नी यदा कदा एक लंच टिफिन लेते थे. उसमें दोनों के लिए पर्याप्त भोजन होता है. चार लंच के बारे में मैंने कहा कि पिताजी को देखने के लिए लोग आ रहे हैं, उनको भोजन करना है.

सूर्या ट्रॉमा सेंटर की केन्टीन के कर्ता धर्ता – रामधारी यादव

रामधारी ने इसपर एक किस्सा सुनाया. एक आदमी पेड़ से गिर गया तो टांग टूट गई. अस्पताल में भर्ती किया गया. ऑपरेशन कर हड्डी जोड़ी गई. प्लास्टर लगा. चूंकि उसे गाँव देहात में बहुत लोग जानते थे, बहुत से लोग अस्पताल देखने आने लगे. उनके चाय पानी पर खर्चा होने लगा. कुछ देखने वाले दूर से आते थे और उन्हें भोजन भी कराना होता था. एक दो दूर वाले दो तीन रोज रुक भी जाते थे.

एक देखने आने वाले ने पूछा – चच्चा, टांग कब टूटी?

मरीज ने जवाब दिया. “टांग पहले नहीं टूटी थी. टांग तो (यहां देखने आने वालों की आवभगत में) अब टूट गई है.” 😆

मुझे लगता है कि आपके और रामधारी के पास अगर बातचीत करने का समय हो तो रामधारी की रोचक बातें आपको बाँध सकती है.

केन्टीन का भोजन कक्ष

केन्टीन में बैठने की व्यवस्था है. जो लोग कमरों या वार्ड में भोजन करना चाहते हैं, उनके लिए तीन खाने वाले मिल्टन के इनस्युलेटेड टिफिन बॉक्स भी उपलब्ध हैं. दिन में दो बार रामधारी घूम घूम कर लोगों को चाय पिला देते हैं. अस्पताल में हर कोई उन्हें यादव जी के नाम से जानता, संबोधित करता है.

कुल मिला कर अच्छी और सस्ती सुविधा कही जाएगी यह कैंटीन और उसके अच्छे और जानदार घटक हैं संजय और यादव जी.

कमरों और वार्ड में दिया जाने वाला भोजन इन टिफिन डिब्बों में होता है.