रवींद्रनाथ दुबे – एन.आर.वी. और शहर-गांव का द्वंद्व

रवींद्रनाथ जी अपने गांव से हर समय किसी न किसी प्रकार जुड़े रहे हैं। वे मेरी तरह “बाहरी” नहीं हैं।


अगर एन.आर.आई. होते हैं – नॉन रेजिडेण्ट इण्डियन तो वे लोग जो गांव छोड़ कर लम्बे अर्से से मेट्रो शहरों में रहने लग गये हों और जिनकी अगली पीढ़ी वहीं पली-बढ़ी हो; वहीं के सपने देखती हो; वहीं के आचार-विचार-व्यवहार जीती हो; उन लोगों को एन.आर.वी. – नॉन रेजिडेण्ट विलेजर (Non Resident Villager) कहा जा सकता है। इस गांव के श्री रवींद्रनाथ दुबे जी को उस श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्री रवींद्रनाथ (सुभाष) दुबे जी

आज रवींद्रनाथ जी गांव (विक्रमपुर) से लसमणा की प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर सवेरे की सैर करते मिल गये। मैँ साइकिल से वापस लौट रहा था और वे आगे जा रहे थे। बोले कि बड़े डरते डरते घर से निकले हैं। हाइवे पर उन्हे आशंका थी कि कोरोनावायरस सम्बंधी लॉकडाउन में कहीं कोई पुलीस वाला न मिले और अपनी लाठी के जोर पर अभद्रता न कर बैठे। उनके पास एक बढ़िया चमकती बेंत वाली छड़ी थी। पैण्ट और बंडी पहने थे। साफ और सुरुचिपूर्ण वेश। उनका चेहरा सवेरे की सूरज की रोशनी में चमक रहा था। वे अत्यंत शरीफ और सरल लगते हैं। बहुत ही प्रिय और मोहक व्यक्तित्व है उनका।

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श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय

मेरे लिए तो कृष्ण अवतार जी रोल मॉडल हैं. धारा प्रवाह सुसंस्कृत अवधी.. बुढ़ापे को सम्मानजनक रुप से काटने के लिए सजग और देश काल पर सूक्ष्म अवलोकन वाली दृष्टि.


कल मेरे पट्टीदार श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय जी आए. पिताजी से पांच साल छोटे. पिताजी के देहावसान पर मुझे सांत्वना देना मुख्य ध्येय था उनके आने का.

अस्सी पार हैं वे. शिक्षा विभाग में राजपत्रित अधिकारी रह चुके थे और बहुत प्रखर आदर्शवादी थे/हैं.

पिताजी के लिए उन्होंने कहा कि वे उनके रोल मॉडल थे. उस समय प्रथम श्रेणी के इंटर पास किए थे. बताया कि उनके (मेरे पिताजी के) बारे में उस समय गांव देस के माँ बाप कहते थे – उनके जैसा बनो.

पर मेरे लिए तो कृष्ण अवतार जी रोल मॉडल हैं. धारा प्रवाह सुसंस्कृत अवधी. अनेक विषयों पर कमांड और पुस्तकों का लेखन. बुढ़ापे को सम्मानजनक रुप से काटने के लिए सजग और देश काल पर सूक्ष्म अवलोकन वाली दृष्टि. मुझे लगता है कि इस अवस्था में भी वे घोर पढ़ने वाले होंगे. वे कह रहे थे कि पठन सामग्री का तो विस्फोट है आजकल. जितना पढ़ो उससे कई गुना इन्टरनेट और सोशल मीडिया थमा देता है.

कृष्ण अवतार पाण्डेय जी

उनका अंश मात्र भी बन पाया तो सौभाग्य होगा मेरा.

गांव के बारे में बताने लगे – उस जमाने में दो तीन लोग कलकत्ता गए थे और एक बम्बई. अब तो अनेक बाहर हैं. अनेक शहरों में. देस में और परदेश में भी. भांति भांति की नौकरी कर रहे हैं बाहर जा कर नौजवान. देहात में बूढ़े और पुरनियां भर बचे हैं. गांव में अब भूत चुड़ैल भी कम हो गई हैं. उनको देखने और गढ़ने वाले भी अब उतने नहीं रह गए.

करीब घंटा भर रहे वे मेरे यहां और उनके जाने के बाद मुझे लगा कि धारा प्रवाह अवधी में बोल बतियाने का संक्रमण दे गए मुझे.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व! 🙏


अतिवृष्टि की सुबह, अस्पताल में

क्वार महीने का आधा खतम हो रहा है. कल अमावस्या है. कल श्राद्ध पक्ष समाप्त हो जाएगा. परसों नवरात्र प्रारंभ होगा. पर इस समय इतनी तेज बारिश पहले किसी साल हुई हो, याद नहीं पड़ता….



आज रात भर बारिश होती रही. अस्पताल के कमरे में जब भी रात में नींद खुली, और साठ की उम्र पार करने के बाद ब्लैडर की क्षमता कम हो जाने के कारण ज्यादा ही खुलती है, तेज बारिश की आवाज और खिड़की से यदा कदा बिजली की चमक का एहसास होता रहा.

सवेरे उठने के बाद चाय का बहुत इंतजार करना पड़ा. घर में हमारे ड्राइवर साहब नहीं आए थे. घर से वही चाय ले कर आते हैं.

हमारा घर वहां ब्राह्मणों की बस्ती से अलग चमरौटी और पसियान के बीचों-बीच है. अशोक, ड्राइवर साहब ब्राह्मण बस्ती में रहते हैं. बारिश इतनी हो रही थी कि मेरे घर तक आने का साहस और मन ही न बना पाए वे.

बारिश में भीगता अस्पताल का गार्ड.

यहां सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में ऊपर बरसाती में कैंटीन है. मेरी पत्नीजी वहां भी हो कर आयीं. पता चला कि वहां दूध नहीं आया है. सो चाय नहीं बन सकती. बारिश में अस्पताल के बाहर किसी चाय की दुकान पर भीगते हुए जाने का साहस हममें नहीं था.

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