उस पार



वह लाल कमीज और लुंगी पहने आदमी अपना ऊंट एक खेत में खड़ा करता है। ऊंट की नकेल की नाइलॉन की रस्सी एक बेल की जड़ में बान्धता है। खेत का उपयोग अब कोन्हड़ा, लौकी की फसल लेने में नहीं हो रहा। वह ऊंट स्वच्छ्न्दता से चर सकता है बची हुयी बेलें।

Photo0484

ऊंट चरन-कर्म में न देरी करता है और न किसी प्रकार की दक्षता में कमी दिखाता है। मैं उससे उसका नाम पूछता हूं तो दातों में एक लता दबाये वह मुंह ऊपर करता है, पर शायद उसकी समझ में मेरा प्रश्न नहीं आता। वह फिर चरने में तल्लीन हो जाता है। अचानक उसके मुंह से एक डकार जैसी आवाज सुनता हूं – विचित्र है – ऊंट भी डकार लेता है।

Photo0491

लाल कमीज वाले से पूछता हूं – यह ऊंट आपका ही है। भला यह भी कोई सवाल है? यह तो जवाब हो नहीं सकता कि नहीं, यह मेरा नहीं ओसामा-बिन-लादेन का है। मरने के पहले उन्होने मुझे दान दिया था! पर वह लाल कमीज वाला सीधा जवाब देता है – जी हां। उस पार से सब्जी ढ़ोने के काम आता है। जब यह काम नहीं होता तो शहर में और कोई बोझा ढ़ोने का काम करता है ऊंट।

Photo0487

एक गंजा सा व्यक्ति किनारे लगी नाव का ताला खोलता है और लंगर उठा कर नाव में रख लेता है। फिर ये दोनो एक कोने में रखी पतवार उठा लाते हैं। अचानक मैं पाता हूं कि तीन चार और लोग इकठ्ठे हो गये हैं नाव पर चढ़ कर उस पार जाने को। उनमें से दो को मैं पहचानता हूं – चिरंजीलाल और विनोद। एक व्यक्ति के हाथ में लम्बी डांड़ भी है।

Photo0490

बिना समय गंवाये नाव उस पार के लिये रवाना हो जाती है। मेरा मन होता है कि मैं भी लपक कर सवार हो जाऊं नाव में। पर मुझे अपनी नित्य चर्या ध्यान आती है। यह नाव तो दो घण्टे में वापस आयेगी। मैरे पास तो आधे घण्टे का ही समय है घर पंहुचने में।

अपने हाथ क्यों नहीं होता समय? या फिर समय होता है तो प्रभुता झर चुकी होती है! 😦

उस पार चल मन!


Advertisements

मड़ई



मड़ई माने सरपत की टटरी लगा कर बनाई गई झोंपड़ी। बहुत सी हैं यहां शिवकुटी के गंगा किनारे। खेती करने वाले लोग इनका प्रयोग करते हैं। इनके चित्र से प्रेरित हो मैने फेसबुक पर अपना प्रोफाइल चित्र ही मड़ई का कर लिया है।

मेरे यहां मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक (यात्रिक सेवायें) सुश्री गौरी सक्सेना ने तो मेरे लिये मड़ई के चित्रों से प्रभावित हो कर मुझे चने के झाड़ पर टांग दिया – कि मुझे अपने इन चित्रों की प्रदर्शनी करनी चाहिये!

मड़ई का प्रयोग कछार में खेती करने वाले लोग रात में सोने के लिये करते हैं जिससे रखवाली कर सकें। दिन में, जब तेज गर्मी होती है और पौधों/बेलों को पानी देने का काम निपटा चुके होते हैं वे लोग तो भी मड़ई में रह कर खेत राखते हैं जिससे जानवर आदि आ कर फसल बरबाद न कर सकें।

अब सीजन खत्म होने को है। लिहाजा ये झोंपड़ियां परिदृष्य से गायब हो जायेंगी। इनका निर्माण फिर जनवरी-फरवरी में होगा।

आप उनके चित्र देखें!

This slideshow requires JavaScript.


मन्नत-ए-हीरालाल



डेढ़ साल पहले हीरालाल पर रिपोर्ट थी – हीरालाल की नारियल साधना। उसमें है कि हीरालाल ने केश बढ़ा रखे थे और दाढ़ी भी रखी थी किसी मन्नत के चलते। उस समय हीरालाल ने बताया था कि वह मनौती पूरी होने वाली थी।

देश के इस इलाके में मन्नत मानने का चलन है। दक्खिन में भी तिरुपति में केशदान शायद मनौती पूरा होने पर या मनौती मानने के लिये होता है। श्राद्ध पक्ष में लोग बाल नहीं कटाते, दाढ़ी भी नहीं बनवाते। और उसके बाद सिरे से अपने को मूंड लेते हैं।

मनौती में दो पक्ष हैं – मानव की कामना और एक अदृष्य़ शक्ति के अस्तित्व पर विश्वास जो मनौती पूरी करती है।

हम, पढ़े-लिखे भद्रजन भले ही मनौती के इस ऑउटवर्ल्डली अनाउंसमेण्ट को सही न मानते हों और इस तरह का जटा जूट रखना हमें दकियानूसी लगता हो, पर हमारी कही, अनकही प्रेयर्स में वह ऑपरेशन-मन्नत ही तो होता है। लिहाजा हीरालाल का बाल बढ़ाये रखना मुझे अटपटा नहीं लगा था। इसके अलावा इस तरह का वेश रखना तो आदिशंकर के जमाने से जस्टीफाई किया गया है – जटिलोमुण्डी लुञ्चितकेश:… ह्युदरनिमितम बहुकृत वेश: (भजगोविन्दम)।

पर जब अभी हीरालाल से मिला तो पाया कि वे अभी भी केश धारी हैं। पूछने पर बताया कि मन्नत अभी पूरी नहीं हुई।

“अभी साल भर और लगेगा।”

हीरालाल मुझसे आंख मिला कर कम ही बात करते हैं। पता नहीं यह आत्मविश्वास की कमी है या आदत। जब मैने देखा तो दूसरे के खेत से टमाटर तोड़ रहे थे और अपने डोलू (पानी या दूध ले जाने का कमण्डल नुमा डिब्बा) में डाल रहे थे। एक गेन्दे के पौधे में फूल भी अच्छे खिले थे। वह भी तोड़ कर उन्होने सहेज लिये। मैने देखा – डोलू में एक खीरा भी था। खेत वाला नहीं था, पर शायद खेत वाले की उपस्थिति में भी सहजता से तोड़ते हीरालाल।

कछार के खेतों में घूमते हुये मैने नियम बना रखा है कि किसी खेत की रत्ती भर चीज भी नहीं लेनी है, भले ही दूर दूर तक कोई न हो। हीरालाल की तरह वर्जनाहीन होता तो क्या मजे होते! पर क्या होते?

शायद इस जटाजूट के वेश का प्रभाव है या उम्र का, कि हीरालाल का अपनी बिरादरी में असर दीखता है। हीरालाल का केश-वेश मन्नत के लपेट में है, पर है ह्युदरनिमित्त (सरल भाषा में अपने भौकाल और पापी पेट के लिये) ही!

क्या ख्याल है?


प्री-मानसूनस्य प्रथमे प्राते:



प्री-मानसून के प्रथम प्रात: में कालिदास को याद करता हूं। मोहन राकेश को भी याद करता हूं। क्यों? ब्लॉग़ पर कारण बताने की बाध्यता नहीं है। वैसे भी यह साहित्यिक ब्लॉग नहीं है।

कल शाम आंधी आई और ओले पड़े। जिसके गांव में बंटाई पर खेती दे रखी गई है, वह तुरंत फोन लगा कर पूछने लगा कि अनाज खलिहान में भर दिया गया है कि नहीं बोरे में। घर की बिजली सूंघती रहती है आंधी को। टप्प से गुल हो गयी। रात अर्ध निद्रा में बीती। पर सवेरा होते ही गंगा तट पर था मैं।

बहुत शानदार हवा चल रही थी। आसमान में एक ओर बादल थे। जब तक मैं गंगाजल के समीप पंहुचता, बारिश होने लगी। हवा को पीठ दिखाता खड़ा हो गया। अगर उसे देखता तो बारिश की बून्दें  चश्मा भिगो देतीं। एक बड़ा दौंगरा आया और सींच गया मुझे। सर्दी सी लगने लगी। चाय कहां मिलेगी बस्ती से डेढ़ किलोमीटर दूर! लिहाजा रेत में चूल्हा बनाया अपनी संटी से, उस पर भगौना चढ़ाया और दो कप चाय बनाई – साथ में मेरा बेटा चल रहा था बतौर मेरे बॉडीगार्ड!

रेत में चाय बनाई - दो कप!

चाय की गर्माहट (?!) ले आगे बढ़े हम। एक टिटिहरी बहुत जोर से टिंटिंयाते हुये आसमान में उड़ी। हमसे क्या डरती है? हमसे तो दफ्तर में कर्मचारी भी न डरते!

आसमान में उड़ी टिटिहरी - बादलों के समीप!

आज सवेरे सामान्यत: गंगाजी के कछार में घूमने वाले नहीं थे। रेत गीली थी और चलने में तकलीफ नहीं थी। वरन उस पर जो बारिश की बून्दों के निशान थे, उनको पैर से मिटाना अच्छा नहीं लग रहा था। गंगाजी के पानी में सामान्य से ज्यादा लहरें थीं। दूर एक डोंगी जा रही थी । लहरों के खिलाफ और धीरे धीरे।

वापसी में सोच रहा था, रात में नींद न ले पाने पर अगर आज गंगातट की सैर न करता तो कितना वंचित रह जाता पी-मानसून के प्रथम प्रात की अनुभूति से।


श्वान मित्र संजय



श्वान मित्र संजय

कछार में सवेरे की सैर के दौरान वह बहुधा दिख जाता है। चलता है तो आस पास छ-आठ कुत्ते चलते हैं। ठहर जाये तो आस पास मंडराते रहते हैं। कोई कुत्ता दूर भी चला जाये तो पुन: उसके पास ही आ जाता है।

श्वान मित्र संजय - समय मानो ठहरा हो!

कुत्ते कोई विलायती नहीं हैं – गली में रहने वाले सब आकार प्रकार के। कुछ में किलनी पड़ी हैं, कुछ के बाल झड़ रहे हैं। पर कुल मिला कर स्वस्थ कुत्ते हैं।

कल वह गंगाजी की रेती के मैदान में पसरा अधलेटा था। आस पास छ कुत्ते थे। दो कुछ दूरी पर बैठे थे। वह और कुत्ते, सभी सहज थे। कुछ इस तरह से कि अनंत काल तक वह बैठा रहे तो ये कुत्ते भी बैठे रहेंगे। यह सहजता मुझे असहज लगी।

उससे पूछने पर संवाद खोलने में मुझे ज्यादा यत्न नहीं करना पड़ा। सम्भवत: वह अपनी श्वान-मैत्री को ले कर स्वयं गौरवानुभूति रखता था। बायें हाथ से रेत कुरेदते हुये मुझ से बतियाने लगा। जो उसने कहा, वह इटैलिक्स  में है।

रेत में पसरा था वह और पास में बैठे थे कुत्ते

ये सब मेरे मुहल्ले के हैं (मोहल्ला पास में है, ऐसा हाथ के इशारे से बताया)। बहुत प्रेम करते हैं। साथ साथ चलते हैं। वो जो दूर हैं दो वो भी इसी गोल के हैं। उनमें से जो कुतिया है, उसके कई बच्चे इनमें हैं।

रोटी देते होंगे इनको, तभी साथ साथ रहते हैं?

हां, अभी सवेरे नाश्ता करा कर ला रहा हूं [रोटी देने और नाश्ता कराने में बहुत अंतर है, नहीं?]। साथ साथ रहेंगे। इस रेती में दोपहरी हो जाये, बालू गर्म हो जाये, पर अगर यहीं बैठा हूं तो ये साथ में बैठे रहेंगे।

मैने देखा उसके बोलने में कोई अतिशयोक्ति किसी कोने से नहीं झलक रही थी। कुछ  इस तरह का आत्मविश्वास कि अजमाना हो तो यहां दोपहर तक बैठ कर देख लो!

अभी यहां बैठा हूं तो बैठे हैं। जब दूर गंगा किनारे जाऊंगा तो साथ साथ जायेंगे।

अजीब है यह व्यक्ति! शायद रेबीज के बारे में नहीं जानता। कुत्तों से हाइड्रोफोबिया हो जाता है – लगभग लाइलाज और घातक रोग। इज ही नॉट कंसर्ण्ड?!  पर वह श्वान संगत में इतना आत्मन्येवात्मनातुष्ट है कि मैं इस तरह की कोई बात करने का औचित्य ही नहीं निकाल पाया। प्रसन्न रहे वह, और प्रसन्न रहें कुकुर! मैं तो प्रसन्न बनूंगा उसके बारे में ब्लॉग पर लिख कर!

कुछ देर मैं उसके पास खड़ा रहा। नाम पूछा तो बताया – संजय। वहां से चलने पर मैने पलट कर देखा। वह उठ कर गंगा तट की ओर जा रहा था और आठों श्वान उसके आगे पीछे जुलूस की शक्ल में चल रहे थे।

संजय द डॉग-लवर। श्वान-मित्र संजय!

संजय कछार की ओर जाने लगा तो साथ साथ चले श्वान

~~~

शिवकुटी/गंगा के कछार का यह इलाका इलाहाबाद का सबर्ब [sub-urb(an)] नहीं, विबर्ब [vi(llage)-urb(an)] है। सबर्ब होता तो लोग संजय या जवाहिरलाल छाप नहीं, ऑंत्रेपिन्योरिकल होते।

मुझे लगता है कि यह विबर्ब की मानसिकता समय के साथ समाप्त हो जायेगी। इस छाप के लोग भी नहीं होंगे और नहीं होंगे मेरे जैसे लोग जो अपनी सण्टी हाथ में लिये तलाश रहे होंगे उनको। जीडी पाण्डेय, कौन?

मैने फेसबुक की माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर  फुल ब्लॉग पोस्ट ठेलने की कोशिश की थी – गंगा की रेत और मिट्टी। पर यह घालमेल का प्रयोग जमा नहीं! जम जाये तो दुकन यहां से वहां शिफ्ट की जा सकती है। वहां ग्राहक ज्यादा किल्लोल करते हैं!


पिलवा का नामकरण



पिलवा का नाम रखा गया है बुधवा!

जवाहिरलाल मुखारी करता जाता है और आस पास घूमती बकरियों, सुअरियों, कुत्तों से बात करता जाता है। आते जाते लोगों, पण्डा की जजमानी, मंत्रपाठ, घाट पर बैठे बुजुर्गों की शिलिर शिलिर बातचीत से उसको कुछ खास लेना देना नहीं है।

एक सूअरी पास आ रही है। जवाहिर बोलने लगता है – आउ, पण्डा के चौकी पर से चन्नन लगाई ले। सेन्हुरौ बा। लगाइले। (आ, पण्डा की चौकी पर से चन्दन और सिन्दूर लगाले।) सुअरी ध्यान नहीं देती। रास्ता सरसेटे चली जाती है। तब से टिक्कू (कुकुर) दीखता है तो उसके साथ वार्तालाप प्रारम्भ हो जाता है जवाहिर लाल का – आउ सार। तोहू के कछारे में जमीन दिलवाई देई। तुन्हूं खेती करु। हिरमाना होये त बेंचे मजेमें। (आओ साले, तुझे भी कछार में जमीन दिलवा दूं। तू भी खेती कर। तरबूज पैदा हो तो मजे में बेचना।)

टिक्कू ध्यान नहीं देता। उसे दूसरी गली का कुत्ता दीख जाता है तो उसे भगाने दौड जाता है। जाउ सार, तूं रहब्ये कुकुरइ! तोसे न  होये खेती। (जाओ साले, तुम रहोगे कुकुर ही! तुमसे खेती नहीं हो सकती।)

बकरियां आती हैं तो उन्हे भी कछार में जमीन दिलाने की पेशकश करता है जवाहिर। बकरियों को दूब चरने  में रुचि है, खेती करने में नहीं!

एक छोटा पिल्ला कई दिन से घाट पर चल फिर रहा है। बहुत चपल है। सरवाइवल की प्रक्रिया में बच गया है तो निश्चय ही अपनी गोल का उत्कृष्ट नमूना है। अपने से कहीं ज्यादा बड़ों से भिड़ जाता है। बकरियों को भूंक रहा है – भगाने को।

मैं जवाहिर से पूछता हूं – इसका कोई नाम नहीं रख्खा? जवाहिर की बजाय एक और सज्जन जवाब देते हैं – अभी नामकरण संस्कार नहीं हुआ है इस पिल्ले का!

जवाहिरलाल - शिवकुटी घाट की संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग!

दो दिन बाद जवाहिर मुझे देख खुद बोलता है – नाम धई देहे हई एकर, बुधवा। आउ रे बुधवा। (नाम रख दिया है इसका बुधवा। आ रे बुधवा।) बुधवा सुनता नहीं! जवाहिर मुझसे बहुत कम बात करता है पर आज शुरू हो गया – ऐसे भी मस्त बा एक और पिलवा। बन्ने मियां के घरे रह थ। पर सार माई क दूध पी क पड़ा रह थ। लई आवत रहे, आई नाहीं। … जब खाइके न पाये तब औबई करे! (इससे भी ज्यादा मस्त एक पिल्ला है। बन्ने मियां के घर में रहता है। पर साला मां का दूध पी कर पड़ा रहता है। मैं ला रहा था, पर आया नहीं। जब खाने को नहीं पायेगा, तब आयेगा।)

जवाहिर ऐसे बात करता है कि बन्ने मियां को जग जानता हो। पर मैं बन्ने मियां में दिलचस्पी नहीं दिखाता। फिर भी जवाहिर जोड़ता है – बहुत मस्त बा सार, बुधवा से ढ़ेर मस्त!

जवाहिर उस मस्त पिलवा के बारे में बात करने के मूड में है। पर मुझे घर लौटने की जल्दी है। मैं घाट की सीढ़ियां चढ़ने लगता हूं।


हरीलाल का नाव समेटना



विनोद प्वॉइण्ट पर भूसा के बोरे और डण्ठल के गठ्ठर दिख रहे थे। एक नाव किनारे लग चुकी थी और दो लोग उसकी रस्सी पकड़ कर उसे पार्क कर रहे थे। हमने तेजी से कदम बढ़ाये कि यह गतिविधि मोबाइल के कैमरे में दर्ज कर सकें। पतला सा नब्बे-सौ ग्राम का मोबाइल बड़े काम की चीज है भविष्य के लिये स्मृतियों को संजोने के लिये। मेरी ब्लॉगिंग का महत्वपूर्ण औजार। कम्यूटर न हो तो काम चल सकता है पर मोबाइल बिना तो शायद ही चले। आखिर जिसके पास शब्द का टोटा हो, वह चित्र से ही काम चलायेगा!

एक साठ साल का आदमी और एक जवान थे नाव के साथ। उनके नाम पूछे तो बड़े थे हरीलाल और जवान रिंकू। समय के साथ नाम ऐसे ही ट्रैण्डी तरीके से रूपांतरित होते जा रहे हैं। हरीलाल एक गठ्ठर और टमाटर की एक पन्नी उतार रहे थे नाव से। रिंकू नाव को खींच किनारे पार्क कर रहे थे। मुझे लगा कि लंगर से नाव बांध कर किनारे खड़ी कर देंगे वे दोनो। रिंकू ने लंगर लगा कर नाव खड़ी कर दी थी; पर अचानक उन लोगों ने अपना इरादा बदला। लगा कि उनका उपक्रम नाव को उठा कर जमीन पर लाने का हो गया है।

दोनो ने पकड़ कर नाव जमीन पर खीच ली। नाव के ऊपरी भाग पर लगे पटरे उतार कर एक जगह तरतीबवार जमा दिये। फिर नाव को और जमीन पर सरकाया। अंतत: उसको दोनो ने पलट दिया। पलटने पर एक पटरे को नीचे अटका कर नाव को पच्चीस-तीस डिग्री के कोण पर टिका दिया।

उस पार खेती का काम खतम हो गया।  गेहूं, सरसों और भूसा की अंतिम खेप भी वे उठा लाये इस पार। अब नाव का कोई उपयोग नहीं। अक्तूबर-नवम्बर में खेती फिर करेंगे कछार में, तब जरूरत पड़ेगी नाव की। हरीलाल ने पूछने पर यह बताया।

अभी कुछ दिन यहीं सूखेगी नाव। सूखने के पहले एक बार उसे रगड़ कर तीन चार बाल्टी पानी से धोयेंगे उसे। फिर तारकोल की एक नयी परत लगाई जायेगी नाव के पृष्ठभाग में। उसके बाद बारह-पन्द्रह लोग मिल कर इसे हरीलाल के घर तक उठा ले जायेंगे। बाकी, नाव काफी अच्छी अवस्था में है। यह बताते हुये उस पर हरीलाल जिस तरह से हाथ फेर रहे थे, उससे लगता था कि वे नाव को अपनी बहुमूल्य सम्पत्ति मानते हैं!

खेती का सीजन खत्मप्राय है।  हरीलाल के चेहरे पर सुकून सा झलकता है। पूछने पर वे बताते हैं कि गेहूं पर्यप्त मिल गया इस साल की खेती में।

हम लोग हरीलाल से पूछते हैं विनोद के बारे में। उनका कहना है कि वह अभी गंगा उसपार काम कर रहा है। सम्भवत: चिल्ला में उनके पड़ोस में रहता  है विनोद का परिवार। पत्नीजी कहती हैं कि चलें उस पार विनोद से मिलने। अगर हम ऋग्वैदिक ऋषि होते तो शायद पानी पर चल पाते कोई मंत्र पढ़ कर। अब तो किसी केवट की तलाश है जो उस पार ले जाये!

इस सब में छ बज गया है। हम लोग सवेरे की सैर से वापस चल देते हैं। पीछे मुड़ कर देखते हैं – हरीलाल, रिंकू और दो छोटी लड़कियां (जो हरीलाल को नाना कह रही थीं) अभी अपने गठ्ठर और नाव के पटरे सहेज रहे थे। ओह! इतनी जल्दी सैर से क्यों लौटना होता है जी?! [मैं हर बार सोचता हूं कि नौकरी में कोई साइडी पोस्ट ले कर सवेरे का बहुत सा समय गंगा किनारे गुजारा जाये। पर तब भय लगता है कि अगर इन सब कृत्यों से मन उचाट हुआ और नौकरी में अपनी वैल्यू तलाशने लगा तो क्या होगा!]

This slideshow requires JavaScript.