शिवकुटी, नारायणी आश्रम और राणा का इतिहास खण्ड



मैने कभी नहीं सोचा कि मैं इतिहास पर लिखूंगा। स्कूल के समय के बाद इतिहास बतौर एक डिसिप्लिन कभी देखा-पढ़ा नहीं। पर यहां इलाहाबाद के जिस शिवकुटी क्षेत्र में रहता हूं – गंगा के तट पर कोई चार-पांच सौ एकड़ का इलाका; वहां मुझे लगता है कि बहुत इतिहास बिखरा पड़ा है। बहुत कुछ को बड़ी तेजी से बेतरतीब होता जा रहा अर्बनाइजेशन लील ले रहा है। अत: यह जरूर मन में आता है कि इससे पहले कि सब मिट जाये या विकृत हो जाये, इसको इस ब्लॉग के माध्यम से इण्टरनेट पर सहेज लिया जाये।

मेरा किसी व्यक्तिगत काम के सन्दर्भ में श्री सुधीर टण्डन जी से मिलना हुआ। श्री टण्डन इलाहाबाद के प्रतिष्ठित टण्डन परिवार से हैं। मेरे घर के पास का रामबाग उन्ही की पारिवारिक सम्पत्ति है। (विकीमेपिया पर मेरी प्रस्तुत यह सामग्री देखने का कष्ट करें, जिसमें रामबाग की प्लेक के चित्र हैं। प्लेक में रामबाग के मालिक श्री रामचरन दास के साथ उसका सन भी लिखा है – सन 1898!)

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डिसऑनेस्टतम समय



सुना है कि यह भारत में डिसऑनेस्टतम समय है। कभी कहा जाता था कि भारत को चंगेज खान ने लूटा, तैमूर लंग ने लूटा, अब्दाली ने लूटा, अंग्रेजों ने लूटा।

अब लूटने का नम्बर भारतीय लूट-एलीट का है। आये दिन नये नये नाम आ रहे हैं। इनके सामने चंगेज/तैमूर/अब्दाली/अंग्रेज पिद्दी नजर आते हैं। मुंह पिटाऊ। खाने की तमीज नहीं थी इनको।

सबसे लुटेरी साबित हो रही है भारतीय कौम। और तो बाहरी लोगों को लूटते हैं। ये घर को लूट रहे हैं। ऑनेस्टी पैरों तले कुचली जा रही है। Continue reading “डिसऑनेस्टतम समय”

साइकल कसवाने का आह्लाद



बनारस में अंश के लिये साइकल कसवाई जा रही थी। अब बड़ा हो गया है वह। साइकल चलाने लायक। उसके पिताजी ने मुझे मोबाइल पर साइकल कसवाने की सूचना दी।

वे बनारस में साइकल की दूकान पर और मैं इलाहाबाद में अपने दफ्तर में। मैने कहा – जरा साइकल का चित्र तो दिखाइये!

बस कुछ मिनटों की बात थी कि उन्होने अपने मोबाइल पर लिया चित्र मुझे ई-मेल कर दिया। मैं फोटो भी देख रहा था और उस साइकल के सामने की टोकरी के बारे में बात भी कर रहा था! Continue reading “साइकल कसवाने का आह्लाद”

पकल्ले बे, नरियर!



Coconut पांच बच्चे थे। लोग नवरात्र की पूजा सामग्री गंगा में प्रवाहित करने आ रहे थे। और ये पांचों उस सामग्री में से गंगा में हिल कर नारियल लपकने को उद्धत। शाम के समय भी धुंधलके में थे और सवेरे पौने छ बजे देखा तब भी। सवेरे उनका थैला नारियल से आधा भर चुका था। निश्चय ही भोर फूटते से ही कार्यरत थे वे।

गरीब, चपल और प्रसन्न बच्चे।

उनमें से एक जो कुछ बड़ा था, औरों को निर्देश देता जा रहा था। “देखु, ऊ आवत बा। हिलु, लई आउ! (देख, वह आ रहा है। जा पानी में, ले आ।)”

Coconut1 घाट पर नहाती स्त्रियां परेशान हो जा रही थीं। गंगा की धारा तेज थी। बच्चे ज्यादा ही जोखिम ले रहे थे। बोल भी रही थीं उनको, पर वे सुन नहीं रहे थे। पता नहीं, इन बच्चों के माता पिता होते तो यह सब करने देते या नहीं!

एक छोटा बच्चा नारियल के पीछे पानी में काफी दूर तक गया पर पकड़ नहीं पाया। मायूस हो पानी से निकल खड़ा हो गया। दो दूसरे दूर धारा में बहते नारियल को देख कर छप्प से पानी में कूद गये। उनका रिंग लीडर चिल्लाया – पकल्ले बे, नरियर! (पकड़ ले बे, नारियल!)

पर बहाव तेज था और नारियल दूर बहता जा रहा था। तैरे तो वे दूर तक, लेकिन पकड़ नहीं पाये।Coconut5

घाट पर नवरात्र की पूजा सामग्री फैंकने आये जा रहे थे लोग। पॉलीथीन की पन्नी समेत फैंक रहे थे। घाट पर कचरा पाट उसकी ऐसी-तैसी कर; गंगा का पानी सिर पर छिड़क रहे थे और बोल रहे थे – जय गंगा माई!

कलियुग है। सन्तान अपनी मां का वध कर दे रही है। इन सब की एक बाजू में श्रद्धा है और दूसरी में गंगाजी को मारने का फंदा, जिसे वे धीरे धीरे कस रहे हैं सामुहिक रूप से। बनारस में वरुणा की मौत देखी है। सईं और गोमती मृतप्राय हैं। गंगाजी कतार में हैं।

खैर, छोड़ें यह पर्यावरणीय रुदन!

पकल्ले बे, नरियर!

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हिन्दी ब्लॉगिंग क्या साहित्य का ऑफशूट है?



बहुत सी समस्यायें इस सोच के कारण हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग साहित्य का ऑफशूट है। जो व्यक्ति लम्बे समय से साहित्य साधना करते रहे हैं वे लेखन पर अपना वर्चस्व मानते हैं। दूसरा वर्चस्व मानने वाले पत्रकार लोग हैं। पहले पहल, शायद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में पत्रकारिता भी साहित्य का ऑफशूट थी। वह कालांतर में स्वतंत्र विधा बन गयी।

मुझे हिन्दी इतिहास की विशेष जानकारी नहीं है कि साहित्य और पत्रकारिता में घर्षण हुआ या नहीं। हिन्दी साहित्य में स्वयम में घर्षण सतत होता रहा है। अत: मेरा विचार है कि पत्रकारिता पर साहित्य ने वर्चस्व किसी न किसी समय में जताया जरूर होगा। मारपीट जरूर हुई होगी।

 

वही बात अब ब्लॉगरी के साथ भी देखने में आ रही है। पर जिस प्रकार की विधा ब्लॉगरी है अर्थात स्वतंत्र मनमौजी लेखन और परस्पर नेटवर्किंग से जुड़ने की वृत्ति पर आर्धारित – मुझे नहीं लगता कि समतल होते विश्व में साहित्य और पत्रकारिता इसके टक्कर में ठहरेंगे। और यह भी नहीं होगा कि कालजयी लेखन साहित्य के पाले में तथा इब्ने सफी गुलशन नन्दा छाप कलम घसीटी ब्लॉग जगत के पाले में जायेंगे।

चाहे साहित्य हो या पत्रकारिता या ब्लॉग-लेखन, पाठक उसे अंतत उत्कृष्टता पर ही मिलेंगे। ये विधायें कुछ कॉमन थ्रेड अवश्य रखती हैं। पर ब्लॉग-लेखन में स्वतंत्र विधा के रूप में सर्वाइव करने के गुण हैं। जैसा मैने पिछले कुछ महीनों में पाया है, ब्लॉगलेखन में हर व्यक्ति सेंस ऑफ अचीवमेण्ट तलाश रहा हैअपने आप से, और परस्पर, लड़ रहा है तो उसी सेंस ऑफ अचीवमेण्ट की खातिर। व्यक्तिगत वैमनस्य के मामले बहुत कम हैं। कोई सज्जन अन-प्रिण्टएबल शब्दों में गरिया भी रहे हैं तो अपने अभिव्यक्ति के इस माध्यम की मारक क्षमता या रेंज टेस्ट करने के लिये ही। और लगता है कि मारक क्षमता साहित्य-पत्रकारिता के कंवेंशनल वेपंस (conventional weapons) से ज्यादा है!

मैं यह पोस्ट (और यह विचार) मात्र चर्चा के लिये झोँक रहा हूं। और इसे डिफेण्ड करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी अंतत: हिन्दी ब्लॉगरी में टिकने का अभी क्वासी-परमानेण्ट इरादा भी नहीं बना। और यह भी मुगालता नहीं है कि इसके एडसेंस के विज्ञापनों से जीविका चल जायेगी। पर यह विधा मन और आंखों में जगमगा जरूर रही है – बावजूद इसके कि उत्तरोत्तर लोग बर्दाश्त कम करने लगे हैं।

क्या सोच है आपकी? 


सुरियांवां के देवीचरण उपाध्याय के रेल टिकट



देवीचरण उपाध्याय सुरियांवां के थे. बोधिस्त्व के ब्लॉग में सुरियांवां का नाम पढ़ा तो उनकी याद आ गयी. मैं देवीचरण उपाध्याय से कभी नहीं मिला. मेरी ससुराल में आते-जाते थे. वहीं से उनके विषय में सुना है.

जो इस क्षेत्र को नहीं जानते उन्हे बता दूं – इलाहाबाद से रेल लाइन जाती है बनारस. वह सुरियांवां के रास्ते जाती है. ज्ञानपुर, औराई उसके पास हैं. जिला है भदोही. ये स्थान पहले बनारस के अंतर्गत आते थे. मेरा ससुराल है औराई के पास.

देवीचरण उपाध्याय मेरी ससुराल पँहुचते थे और दरवाजे पर घोषणा करते थे – “हम; देवीचरण!”

मेरी सास कहती थीं – “लो; आ गये. अब भोजन बनाओ!” भोजन बनता था वैसे मेहमान के लिये जो रुकने वाले हों और प्रतिष्ठित हों. देवीचरण उपाध्याय मेरे श्वसुरजी के फुफेरे भाई थे. उनसे उम्रमें काफी बड़े. अक्सर आते-जाते रहते थे. ज्यादातर यात्रा रेल से करते थे.

खास बात यह थी; और जिस कारण से यह पोस्ट लिखी जा रही है; वे कभी रेल टिकट नहीं लेते थे. साथ में पीले पड़ चुके पुराने कागजों का पुलिन्दा ले कर चलते थे. कोई टीटीई अगर अपने दुर्भाग्य से उनसे टिकट पूछ बैठता था तो वे कागजों का पुलिंदा खोल लेते थे. वे कागज रेलवे लाइन बिछाने के लिये किये गये जमीन के अधिग्रहण से सम्बन्धित थे. एक एक कागज पर पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन की तरह वे बताने लगते – कौन सी उनकी जमीन रेलवे ने कौड़ियों के भाव किस तरह अधिग्रहीत की थी. उन्होने कौन सा प्रतिवेदन किसे दिया था जिसका सरकार ने संतोषजनक निपटारा कभी नहीं किया. इस प्रकार सरकार ने उन्हे कितने का चूना लगाया था. इस प्रेजेण्टेशन के बाद पंचलाइन – आखिर वह टीटीई किस मुह से उनसे टिकट मांग रहा है?

टीटीई अगर अकलमन्द होता था तो पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन प्रारम्भ होते ही बैक-ट्रैक कर खिसक लेता था. नहीं तो पूरा पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन ग्रहण कर के जाता था. टिकट तो देवीचरण उपाध्याय को न लेना था न कभी लिया! टिकट न लेना तो देवीचरण उपाध्याय जी के एण्टी-एस्टेब्लिशमेण्ट होने का प्रमुख प्रतीक था.

टीटीई ही नहीं, अफसर और मेजिस्ट्रेट चेकिंग को भी देवीचरण उपाध्याय जी ने पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन के माध्यम से ही निपटाया था. न कभी जेल गये, न जुर्माना दिया न टिकट खरीदा.

मैं इस पोस्ट के माध्यम से टिकट न लेने की प्रवृत्ति को उचित नहीं बता रहा. मैं सरकार की अधिग्रहण नीति पर भी टिप्पणी नहीं कर रहा. मैं तो केवल सुरियांवां, देवीचरण उपाध्याय और उनकी खुद्दारी की बात भर कर रहा हूं. देवीचरण उपाध्याय अब दुनियाँ में नहीं हैं. पर सुरियांवां का नाम आया तो याद हो आई.

अभी डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर – जो बड़ा महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट है रेलवे के लिये; और जिसके लिये बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होगा; कितने देवीचरण उपाध्याय पैदा करेगा? या इस प्रकार के चरित्र पैदा भी होंगे या नहीं – पता नहीं.


किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय



मधुकर उपाध्याय द्वारा लिखी किस्सा पांड़े सीताराम सूबेदार,सारांश प्रकाशन द्वारा सन 1999 में प्रकाशित।

बहुत पहले जब बीबीसी सुना करता था, मधुकर उपाध्याय अत्यंत प्रिय आवाज हुआ करती थी. फिर उनकी किताब किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार की समीक्षा वर्ष २००० मे रतलाम में पढी। समीक्षा इतनी रोचक लगी कि वह पुस्तक दिल्ली से फ्रंटियर मेल के कंडक्टर से मंगवाई।

पहले बात मधुकर जी की कर ली जाये। मधुकर जी से मैं व्यक्तिगत रुप से जान-पहचान नहीं रखता हूँ। उनको बीबीसी पर सुनता था,वही परिचय है। उनकी आवाज अत्यन्त मधुर है। बीबीसी सुनना बंद हो गया तो उनसे भी कट गया। उनके बीबीसी पर भारतीय स्वातंत्र्य के १५० वर्ष होने पर धारावाहिक शृंखला में बोलने और उनकी दांडी यात्रा पुन: करने के विषय में काफी सामग्री मैंने अखबार से काट कर रखी थी, जो अब इधर- उधर हो गयी है।

वर्ष २००३-०४ मे उन्हें टीवी चैनल पर समाचार पत्रों की समीक्षा में कई बार देखा था। उनके व्यक्तित्व में ओढ़ी दार्शनिकता या छद्म-बौद्धिकता के दर्शन नही हुये, जो आम पढ़े-लिखे (और सफ़ल?) भारतीय का चरित्र है। फिर पता चला कि मधुकर लोकमत समाचार के ग्रुप एडीटर हो गए हैं। अभी व्हिस्पर न्यूज़ में था कि वहाँ से त्यागपत्र दे दिया है। पता नही सच है या नही। अखबारों में जो बाजार हथियाने की स्पर्द्धा चला रही है, वहा निश्चय ही तनाव देने वाली रही होगी। खैर, पुस्तक पर छपे के अनुसार वे मेरे समवयस्क होंगे। अगर ईश्वर अपना मित्र चुनने की आजादी देते हों तो मैं मधुकर उपाध्याय को चुनना चाहूँगा। Continue reading “किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय”