कोविड19 और आत्मनिर्भरता – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट

धन्यवाद प्रधानमंत्री जी को दिया जाये या कोविड19 के भय को; हर व्यक्ति घर में कुछ न कुछ काम करना सीख गया है। मेरे घर में सब काम में लगे हैं।


आजकल घर का काम निपटा कर मेरी पत्नीजी कागज कलम उठा कुछ न कुछ रोज लिख रही हैं। जितना काम – घर की साफ सफाई, पौधों की देखभाल, कपड़े धोना, प्रेस करना आदि – पहले करती थीं, उससे दुगना कर रही हैं। पर उसके बावजूद भी आधा घण्टा समय निकाल कर एक – डेढ़ पेज लिख रही हैं। मेरा काम उसे टाइप कर ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट के रूप में प्रस्तुत करना हो गया है!

उनकी पोस्ट प्रस्तुत है –


“अपना हाथ, जगन्नाथ” कहावत है। अपने हाथ, अपने परिवार पर भरोसा भारतीय समाज का मुख्य अंग हुआ करता था। घर के काम घर के लोग आपस में मिलबांट कर किया करते थे। गांव में तो यह अब भी दिखता है।

चिन्ना पांड़े बर्तन पोंछ कर रखती हुई

समय के साथ लोग नौकरियों पर निर्भर होते गये। तमाम काम मशीनों ने ले लिया। रसोई का बहुत सा काम मशीनों से होने लगा।

बचपन में देखा था पड़ोस के परिवार को। गांव में एक बूढ़ी नानी हुआ करती थीं। उनकी बहू कभी पेट दर्द की शिकायत करती तो बूढ़ी नानी कहतीं – पांच सेर गेंहू जांत (हाथ चक्की) से पीस लो; पेट दर्द अपने आप खतम हो जायेगा।

मेरी नानी कहा करती थीं कि सूर्योदय से पहले अपना आंगन बुहार देना चाहिये। इससे लक्ष्मी मईया प्रसन्न होती हैँ। आज की पीढ़ी के लिये शायद ये मजाक की बात लगती होगी।

सामान्यत: अपने हाथ से घर का काम करने की प्रवृत्ति खतम होती गयी। उससे मोटापा बढ़ा और मोटापे के साथ आयीं सौ बीमारियाँ।

ज्ञान दत्त पाण्डेय चाय बनाते हुए। वैसे रसोई का काम मुख्यत: बहू (बबिता) सम्भालती है।

धन्यवाद प्रधानमंत्री जी को दिया जाये या कोविड19 के भय को; हर व्यक्ति घर में कुछ न कुछ काम करना सीख गया है। मेरे घर में सब काम में लगे हैं। लड़का मटर छीलता है, सामान रखता-रखाता है। पति चाय बना लेते हैं। बिस्तर भी समेटते-सहेज लेते हैं। बहू पोती को पढ़ाती है और रसोईं का अधिकतर काम सम्भालती है। यहां तक की छ साल की पोती – चीनी भी बर्तन रखने में मेरी सहायता करती है।

कई तरह के वीडियो वायरल हो रहे हैं। बाईयाँ आ नहीं रही हैं तो फिल्मी हीरोइनेँ भी अपने घर में झाड़ू लगा रही हैं। बीस-इक्कीस दिन का लॉकडाउन बहुत सी आदतें बदल देगा; बहुत कुछ सिखा जायेगा।

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय मटर छीलते हुए

झूला

झूला हमारे गांव की जिन्दगी के सेंस ऑफ प्राइड की वस्तुओं में प्रमुख है।


यह बेंत का बना झूला करीब डेढ़ दशक पुराना है। बरेली से खरीदा हुआ। उस समय मैं इज़्ज़त नगर गया था रेलवे की ड्यूटी पर और वहीं से खरीद कर साथ लेता आया था। इसकी कड़ी गोरखपुर के रेलवे स्टाफ ने कहीं से अरेंज कर दी। उसके बाद यह हमारे ड्राइंग रूम या बरामदे का अभिन्न अंग बन गया। रिटायरमेंट के बाद यह गांव के इस घर का अंग बन गया है।

झूला

सोचने की प्रक्रिया को यह उत्प्रेरित करता है। इसपर बैठ कर धीरे धीरे हिलते हुए मन में विचार बहुत गहरे से उठते हैं। देर तक ठहरते हैं। मन चंचल नहीं रहता। मानसिक हलचल मंद बयार में हिलती लहरों की तरह होती है।

गुड़िया (नाम चितवन) आई थी मुंबई से। वह वहां डाक्टर है। सफल। मुझसे बीस साल छोटी होगी। मुंबई के किसी प्राइम लोकेशन पर उसका अच्छा फ्लैट है। पर वह शहरी स्नॉब नहीं है। बहुत प्रिय व्यक्तित्व है उसका।

मेरा मकान देख कर गुड़िया बहुत प्रभावित और प्रसन्न थी। अपने भाई से बोली – बगल के (उसके पिता के खेत में) एक ऐसा ही बंगला बनना चाहिए। और उसमें “ऐसा झूला इज़ ए मस्ट”।

पोर्टीको, जिसमें झूला लगा है।

झूले की मरम्मत पर हम ध्यान देते हैं। उसकी पॉलिश नियमित की जाती है। उसकी सुतली कसी जाती है। डस्टिंग पर नियमित रहा जाता है।

गांव की जिन्दगी में कुछ ही चीजें हैं, जिनमें सेंस ऑफ प्राइड है मेरा। मेरी साइकिल और मेरा झूला उसमें से प्रमुख हैं।

कोविड19, दहशत, और शहर से गांव को पलायन – रीता पाण्डेय की पोस्ट

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।


कल की पोस्ट के बाद रीता पाण्डेय ने यह लिखा –

मेरी एक परिचित ने फोन पर पूछा कि अगर (गांव में) पित्जा खाने का मन हो तो मैं क्या करती हूं? उन्होने कहा कि वे लोग तो पित्जा और कोल्डड्रिंक के बिना रह ही नहीं सकते। वो तो गांव के इन चीजों के बिना जीवन की सोच भी नहीं सकतीं। मुझे उनपर हंसी आयी।

एक दूसरे परिचित ने कहा कि क्या ग्लैमरस लाइफ है आपकी। इतना बड़ा घर और इतनी हरियाली! बड़े शहर में तो इसका ख्वाब ही देख सकते हैं।

गांव की हरियाली

इन लोगों को अपने और गांव के बारे में यह सब याद आ रहा है कोरोनावायरस के चक्कर में।

गांव में कुछ दिन पहले कुछ यादव और कुछ दलित बस्ती के लोग किराये पर टेक्सी कर मुम्बई से भाग कर आये। दिहाड़ी कमाने वाले लोग हैं वे। जब वहां सब बंद हो गया तो रहने और जीविका के लाले पड़ गये। उनके आने पर गांव वालों ने नाराजगी जताई। बताते हैं कि अभी वे अपने घर में ही हैं और चुपचाप रह रहे हैं।

कुछ सवर्ण भी, जो बाहर नौकरी करते थे, अपने वाहन से परिवार समेत गांव आये। प्रश्न उठा, मन में, कि ये सब लादफांद कर गांव क्यों आ रहे हैं? पहले, हमारे बचपन में, स्कूल कॉलेज बंद होने पर हम लोग भाग कर गांव आते थे और गर्मियों में मजे में यहां रहते थे। अब मेट्रो शहरों में लॉकडाउन है। स्कूल कॉलेज, ऑफिस, बाजार, मनोरंजन के साधन और निकलने-घूमने की जगहें, सब बंद हैं। और दहशत और है, ऊपर से। इससे, जिसके पास विकल्प है, जिसके पास गांव में ठिकाना है; वह वापस दौड़ लगा रहा है (अगर चांस लग रहा है, तब)।

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।

गांव की अपनी समस्यायें हैं – शिक्षा की या चिकित्सा की। पर ये भी प्रशासनिक फेल्योर का नतीजा हैं। मनरेगा में पैसा झोंक कर ग्रामीणों को विधिवत अकर्मण्य बनाया गया। और अब खेती जैसे मेहनत के काम में मन न लगना उसी के कारण है।

इन सब के बावजूद; अभी भी गांव सहज है, सामान्य है और जागरूक है। दहशत टेलीवीजन फैला रहा है। वैसे यह भी है कि कोरोनावायरस के प्रति जागरूकता भी टेलीविजन से ही आयी है। दूसरे, शहर से भाग कर गांव में आने वाले गांव को कहीं ज्यादा भयभीत कर रहे हैं। वर्ना, गांव की आंतरिक रचना में किराना, दूध, सब्जी जैसी रोजमर्रा की चीजों की कोई समस्या नहीं।

गांव

हां, पित्जा और कोल्डड्रिंक नहीं मिल रहा है! पर वह इस माहौल में तो शहरियों को भी नसीब नहीं है! 😆


आज हवाओं में भी जहर है – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट

कठिन समय तो है, पर कठिनाइयों में ही आदमी की क्षमता परखी जाती है। लड़े बिना कोई रास्ता न हो तो आदमी सरेण्डर करने की बजाय लड़ना पसंद करता है। जंग छिड़ी है पूरी दुनियां में और जीतना तो है हीl


मेरी पत्नीजी – श्रीमती रीता पाण्डेय घर की कुशल लीडर हैं। कोरोनावायरस के संक्रमण से लड़ने के लिये उन्होने घर के तीन कमरे और दालान नुमा 400 वर्ग फिट का कमरा घर के सदस्यों के लिये सील कर लिया है। वहां और किचन में केवल घर के लोगों का ही प्रवेश है। घर की साफ सफाई और किचन का सारा काम हम लोग – मुख्यत: मेरी पत्नीजी और बहू कर रहे हैं।

रीता यह सब करने के साथ साथ रोज पोर्टिको में बैठ कर एक डेढ़ पेज का लेखन भी कर रही हैं। मन में जो भी चल रहा है, उसे कागज पर उतारने से वे अपनी अभिव्यक्ति की जरूरत भी पूरी कर रही हैं। बखूबी।

पहले दिन जो लिखा, वह प्रस्तुत है –


ह्वाट्सएप्प पर एक संदेश आया। कवि प्रदीप के एक पुराने गाने का वीडियो। “कैसा ये खतरे का पहर है। आज हवाओं में भी जहर है”।

बेतहाशा, बेलगाम भागती दुनियां को एक जबरदस्त ब्रेक लग गया है। सब कुछ ठहर गया है – हवाई जहाज, ट्रेन, बस, कार, मोटर साइकिल – सब कुछ। आदमी, औरत, बच्चे घर में कैद हो कर रह गये हैं।

रीता पाण्डेय

एक खबर चल रही थी कि कुछ युवा अहमदाबाद से राजस्थान पैदल जा रहे थे अपने घरों को। हल्की सी मुस्कान के साथ याद आया कि हमारे ऋषि, संत घूमते हुये चौमासा एक जगह करते थे। पुरखे पैदल चारों धाम की यात्रा किया करते थे। अब क्या जमाना आ गया है। व्यक्ति व्यवधान आने पर अपने घरों की ओर ही चल पड़ा है।

डिजिटल दुनियाँ, चांद पर कॉलोनी बनाने का सपना देखने वाले अपने घुटनों पर आ गये हैं। मुम्बई, दिल्ली का प्रदूषण जीरो पर आ गया है। लोग घरों में अपने परिवार के साथ बंद हैं। हो सकता है अपने बुजुर्गों के साथ बैठ कर भूतकाल की किसी महामारी की चर्चा सुन रहे हों। ये सब लॉकडाउन के कुछ पॉजिटिव पक्ष हैं। … अभी तो शुरुआत है। रेस में लगी दुनियाँ, मौत के भय से डर कर इस फेज को कैसे निभायेगी, यह तो वक्त ही बतायेगा।

गांव में घर के आगे के हिस्से का अरण्य

मेरे पति के रिटायर होने के बाद हमने गांव में बसने का फैसला किया। यहां मेरे पास बड़ा घर है। घर के बहुत बड़े हिस्से में हरियाली है। फूल-पत्ती है। चिड़ियाँ हैं, गिलहरियाँ, नेवले और सांप भी हैं। समय काटना मुश्किल नहीं है। महानगरों में जहां बड़ी बड़ी इमारतों में एक या दो या तीन कमरे के फ्लैट में लोग रहते हैं और खिड़की खोलने पर कांक्रीट के जंगल ही नजर आते हैं; वहां लोग कैसे समय व्यतीत करते होंगे? मुम्बई की चालों में एक कोठरी में शिफ्ट वाइज रहते आठ दस लोगों की हालत और भी बदतर होगी जहाँ कोठरी में अब चौबीसों घण्टे सभी लोग एक साथ होंगे।

पार्क, स्वीमिंग पूल, बाजार, मॉल – सब बंद…

कठिन समय तो है, पर कठिनाइयों में ही आदमी की क्षमता परखी जाती है। लड़े बिना कोई रास्ता न हो तो आदमी सरेण्डर करने की बजाय लड़ना पसंद करता है। जंग छिड़ी है पूरी दुनियां में और जीतना तो है ही!

कोरोना से इस युद्ध में कितने शहीद होंगे, पता नहीं। पर जंग वही जीतता है जो रणनीति बनाता है और उसका कड़ाई से पालन करता, करवाता है।

आशा के प्रदीप को जलाये चलो, धर्मराज; एक दिन होगी मुक्त भूमि रण भीति से…


कोविड19 का सामाजिक अलगाव, गांव और गंगा तट

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।



मुझे लगा कि कोरोना (मुख्यतः) शहरी आपदा है। गांव अगर उससे प्रभावित है तो उस सीमा तक, जिस सीमा तक दिल्ली बंबई में रहने वाले गांव लौट कर गांव को खतरे में डाल रहे हैं।

लोग गांव लौट क्यों रहे हैं? बंबई से कूद फांद कर, एक चार चक्का किराये पर ले उसमें ठूंस कर भरे लोग, सरकारी अमले को धता बताते गांव लौट रहे हैं। और मेहनत मजदूरी करने वाले ही नहीं, मध्य वर्ग के लोग – जिनका गांव से थोड़ा भी कनेक्शन बाकी है – वे भी सपरिवार गांव आ कर पसर गए हैं। आगे भी आयेंगे, यह निर्भर करेगा कि सरकार कितनी कड़ाई से लॉकडाउन का पालन करा सकती है।

शहर जब तक नौकरी देता है, जीवन यापन के साधन देता है, जब तक घूमने और परस्पर मिलने तथा मनोरंजन की सुविधाएं देता है, जब तक लोग वहां टिकते हैं। अन्यथा अन्य ऑप्शन तलाशते हैं। अन्य ऑप्शन में गांव प्रमुखता से आता है।

केवल भारत में ही नहीं है। आज मैने न्यूयॉर्क टाइम्स में पढ़ा कि न्यूयॉर्क के शहरी अन्य स्थानों में पलायन का यत्न कर रहे हैं। मुख्यत: धनी लोग। और जहां जाना चाहते हैं, वहां के लोग उसका विरोध कर रहे हैं।

New York Times की खबर

भारत में वैसा नहीं है। यहां गांव अपने बंधुबांधवों को बाहें खोल कर स्वीकार कर रहा है। यह जरूर है कि जो आये हैं, अपने घर में दुबके हुये हैं। घर वाले भी उनकी सेहत की दशा मॉनीटर कर रहे हैं। पर कोई यह नहीं कह रहा कि “सरऊ काहे आइ गये (साले, क्यूँ आ गए)”?

तनाव है। पुलीस की गाड़ी नजर आती है तो लोग सन्न हो जा रहे हैं। चाय की चट्टी बंद करा दी है। बंद कराने में पुलीस ने मां-बहन का आवाह्न किया है, ऐसा सुनने में आया। पर गांव की अपनी गतिविधियां (कुछ सिकुड़ कर) चल रही हैं। वैसा माहौल नहीं दिखता जैसा टेलीवीजन दिखाता है।

खेत से फसल (सरसों) ले लौटते लोग

शाम के समय देखा तो लोग अपने खेतों में निराई कर रहे थे – इक्का दुक्का नहीं, लगभग उतने ही लोग जितने सामान्य समय में किया करते थे। बच्चे और औरतें शाम होने के कारण अपनी बकरियां और गाय भैंस चरा कर वापस ला रही थीं। ठेले पर मेदिनीपुर में गोलगप्पा और समोसा बेचने वाला भी दिखा। उसके आसपास पांच सात लोग थे। कोलाहलपुर में सड़क पर कुछ अधेड़ औरतें वैसे ही गोल बना कर बैठी आपस में बतियाती नजर आयीं, जैसे हमेशा करती आयी हैं। सड़क के किनारे पाही पर लोग वैसे ही दिखे जैसे सामान्य तौर पर दिखते हैं। हां, लगभग आधे लोग – या कुछ ज्यादा ही, मुँह पर रुमाल या गमछा बांधे थे।

लोगों की उपथिति का घनत्व गांव होने के कारण वैसे भी (शहर की अपेक्षा) कम था, पर वैसा ही था, जैसा सामान्य तौर पर होता है।

सड़क पर वाहन नहीं थे। सामान्यत: मिट्टी ढोने वाले ट्रेक्टर और इक्कदुक्का चार पहिया वाहन दिखते थे, अब वे नहीं दिखे। एक भी नहीं। हां, दूर एक ईंट भट्ठे की चिमनी से धुआँ निकलता नजर जरूर आया। गांव के स्तर पर तो वही उद्योग-धंधा है। और वह बंद नहीं हुआ लगता। भट्ठे में गतिविधि का मतलब वहां ईंट ढालने और ढोने वाले मजदूर तो काम कर ही रहे होंगे।

दूर ईंट भट्ठे की चिमनी से धुंआ निकल रहा था

सोशल डिस्टेन्सिंग की आचार संहिता का पालन करते हुये मैं किसी से बिना मिले, बोले – बतियाये साइकिल चलाते सीधे चलता चला गया। ध्येय था अपनी चार पांच किलोमीटर साइकिल चलाने का व्यायाम पूरा करना। वह बिना किसी बाधा के पूरा कर लिया। आंखों से आसपास की गतिविधियां निहारता भर गया। एक दो जगह चलती साइकिल से या रुक कर चित्र जरूर लिये। बस।

गंगा किनारे सूर्यास्त और बटोही (साइकिल)

गंगा किनारे सूरज डूबने को था। सूर्यास्त के चित्र अच्छे आये। एक कौवा दिखा। करार की ऊंचाई से देखा तो तीन आदमी/बच्चे नदी किनारे अपने हाथ पैर धो रहे थे। शायद पास के गांव कोलाहलपुर से शाम के निपटान के लिये आये होंगे।

गंगा किनारे

वापसी में एक महिला का एक आदमी को कहता शब्द सुनाई पड़ा – खोंखत मरि जाबे, एकर कौनो दवाई नाहीं बा (खांसते मर जाओगे, इसकी कोई दवाई नहीं है)। निश्चय ही वह कोरोनावायरस के बारे में कह रही थी।

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। यह मीडिया का असर है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।

पर अभी तो अपनी गतिविधियां, कमोबेश जारी रखे हुये है। शायद इसी लिये लोग गांव की ओर पलायन कर रहे हैं।


नेफ्रॉलॉजिस्ट डा. अशोक कुमार बैद्य और जीवन की लॉन्गेविटी के प्रश्न

यह ब्लॉग पोस्ट बढ़ती उम्र, अस्वस्थता, उससे उत्पन्न व्यग्रता और जीवन की सार्थकता संबंधी व्यथा पर है। व्यक्तिगत अनुभव।



उम्र बढ़ रही है और लगता है कि अस्पताल के चक्कर लगने की संभावनायें भी बढ़ जाएंगी। 😕

अपने जीवन की दूसरी पारी में, गांव में रहने का निर्णय लेने में यह द्वन्द्व था कि गांव में मैडीकल सुविधायें नहीं मिलेंगी। पर यह भी लग रहा था कि वहां अगर नैसर्गिक जीवन जिया गया, और तनाव कम रहा तो मैडीकल सुविधाओं की जरूरत भी कम रहेगी।

और, पहले चार साल बढ़िया कटे। शायद ही किसी दिन बीमार रहा। पर चार साल बीतते बीतते सारी अस्वस्थता की कसर पूरी हो गयी। मेरे पिताजी अस्पताल में भर्ती हुये और चल बसे। मेरी आशावादी सोच थी कि वे नब्बे की उम्र पायेंगे, पर वे पच्चासी ही पार कर पाये। उसके बाद उनके न रहने के अवसाद और कर्मकाण्डों के तनाव का परिणाम यह हुआ कि तीन सप्ताह के अंतराल में दो बार मुझे UTI – urinary tract infection की अधिकता के कारण अस्पताल मेँ भर्ती होना पड़ा।

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