हरिशंकर मिश्र उर्फ शिवधारी

भारत में – जहां कुटुम्ब व्यवस्था जिंदा है, हरिशंकर जैसा उदाहरण असहज करता है.



इस व्यक्ति को रोज लोटन गुरू के घर के सामने की गड़ही के पास फेंके पॉलीथिन की पन्नियां बीनते देखता हूं. उसके बाद हाईवे के पास मिडिल स्कूल की बगल में बैठे हुए. उनके थैलों में भरी पॉलीथिन से लगता है कि और स्थानों पर भी बीनते होंगे वे चिन्दियां.

नाम पूछने पर बताया हरिशंकर मिश्र, गांव बारी पुर. उसके बाद जोड़ा शिवधारी.

बारी पुर बगल वाला गांव है. उनके उत्तर देने पर यकीन हुआ कि वे विक्षिप्त नहीं, समान्य हैं.

उम्र बताई बहत्तर साल. मैंने कहा – देखने में उतने लगते नहीं! हरिशंकर बोले – आपकी समझ का फ़ेर होगा. है बहत्तर ही.

पोलीथीन जो थैलों में है, उसका क्या करेंगे? यह पूछने पर विषय से इतर उत्तर देते हैं हरिशंकर. “दुल्ही पुर में खेत हैं.” शायद यह चाहते हैं कि मैं उनकी माली हालत खराब न समझूँ.

और पूछने पर बताया कि यहां से दुल्ही पुर जाएंगे, अपने खेत पर.

मैं आधा घण्टा बाद वापस लौटता हूँ तो उन्हें फिर कूड़े के ढेर से चिन्दियां बीनते पाता हूँ.

घर लौट कर अपने वाहन चालक अशोक से उन सज्जन के बारे में पूछने पर अशोक ने बताया कि ये बारी पुर के हैं. बैंक से लोन लिया था. उसको न चुकाने के लिए पगलई की नौटंकी करते हैं. घर से परिवार ने अर्ध परित्यक्त कर दिया है. “अस पगलई करिहीं त अउर का होये?”

पता नहीं सच क्या है. पर उनकी उम्र, वेश और उनके व्यक्तित्व (जो नजर आता है) के अनुसार उन्हें पोलीथीन बीनने वाला तो नहीं होना चाहिये. घर परिवार और समाज को बहत्तर साल के आदमी की कुछ तो देख भाल करनी चाहिए.

भारत में – जहां कुटुम्ब व्यवस्था जिंदा है, हरिशंकर जैसा उदाहरण असहज करता है. लगता है कि वह व्यवस्था चरमरा रही है. और उसके विकल्प में कुछ भी खड़ा नहीं हो रहा. आदमी अपने अकेले के वृद्धावस्था काटने की प्लानिंग तो करता ही नहीं.


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द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर – पास के गांव वाले सूर्यमणि तिवारी जी

इकहत्तर साल से अधिक उम्र के व्यवसायी, तथाकथित वानप्रस्थ की उम्र में, जिस प्रकार स्टेट ऑफ टेक्नॉलजी और मार्केट पर अपने विचार रख रहे थे, वह सुन कर अपने रिटायरमेन्ट पर मुझे संकोच होने लगा.



थॉमस स्टेनली और विलियम देन्को की पुस्तक है – द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर (The Millionaire Next Door). अमेरिका के करोड़पति लोगों के बारे में पुस्तक. अमेरिका सबसे ज्यादा मिलियनेयर बनाने वाला देश है. वहां ज्यादातर लोग चांदी के चम्मच के साथ पैदा होने की बदौलत नहीं, अपनी कर्मठता के बूते मिलियनेयर बनते हैं.

यह पढ़ने योग्य पुस्तक है. यद्यपि 1996 में लिखी/छपी है पर धनी लोगों का समाज-विज्ञान के दृष्टिकोण से अध्ययन करने के लिए आज भी प्रासंगिक है.

Blinkist में The Millionaire Next Door के पुस्तक संक्षेप का पहला पेज

भारत में ऐसे सेल्फ मेड “धनी” लोगों की संख्या कम है. बहुत कम. और जैसा सुनने में आता है, लोग मेहनत की बजाय तिकड़म पर ज्यादा यकीन करते हैं. नेतागिरी – नौकरशाही – अपराध के दांवपेंच (नेक्सस) से पैसा कमाने वाले लोग और उनकी धन-पशुता के किस्से बहुत हैं. पर वे उत्कृष्टता की चाह रखने वाले लोगों के लिए रोल मॉडल तो हो नहीं सकते.

अतः ऐसा अध्ययन – विशेष रूप से ग्रामीण या कस्बाई वातावरण से उठे और नैतिक आधार पर सफल हुए लोगों के बारे में अध्ययन; भारत में तो नहीं हुआ दिखता.

मेरे पास नैतिक मूल्यों पर खरे, एक “भारतीय मल्टी मिलियनेयर नेक्स्ट डोर” से मिलने का अवसर था. सूर्या ट्रॉमा सेंटर में मेरे पिताजी भर्ती थे और वहां से दो किलोमीटर दूर उगापुर नामक गांव में रहते हैं श्री सूर्यमणि तिवारी. वहीं उनका गलीचा उद्योग का कारखाना है. सवेरे नौ बजे तिवारी जी से मिलना तय हुआ. मेरी पत्नीजी और मैं वहां गए. प्रशांत, जिन्हें सूर्य मणि जी विश्वस्त और पुत्रवत मानते हैं, हमें अस्पताल से ले उनके पास पंहुचे.

मोटे तौर पर समझ आई हमें कालीन बनाने की प्रक्रिया, पर गहराई से सभी गतिविधियां जानने के लिए तो कई बार देखना समझना पड़ेगा. वेब सर्च में मुझे बहुत बढ़िया जानकारी नहीं मिली. इसलिए समझने के लिए उगापुर या उसी प्रकार के अन्य उपक्रमों के चक्कर लगाने होंगे. शायद कुछ पुस्तकें भी खंगालनी पडें.

शिव जी के मंदिर में यह बड़ा रोचक यंत्र था. एक DC मोटर से चलता घंटी और नगाड़े का युग्म. पंडित जी शिव स्तोत्र गा रहे थे और स्विच से चालू किए इस यंत्र से घंटी नगाड़ा बजने लगे!

पहले प्रशांत जी ने सूर्या उपक्रम के कारखाना परिसर में हनुमान जी और शिव जी के मंदिर के दर्शन कराए. पुजारी जी ने मेरे मस्तक पर तिलक त्रिपुण्ड लगाया. उसके बाद हमने कारखाने की विविध गतिविधियों का अवलोकन किया. प्रशांत जी ने हम; कार्पेट बनाने की प्रॉसेस से पर्याप्त अनभिज्ञ; दोनों को बड़े धैर्य से सब समझाया.

ऊन से कार्पेट बुनने का धागा बनाने का संयंत्र. तकनीकी नाम मैंने नोट नहीं किया. 🙁

पूरे भ्रमण में जो हिस्सा मुझे ज्यादा रुचा वह था सूर्या कार्पेट्स का कॉफी टेबल बुक साईज के लगभग 1000 पेज का आकर्षक डिजाइन केटलॉग. इस फर्म (Surya Inc.) द्वारा बनाए और बेचे जाने वाले विविध होम और ऑफिस डेकोर के आइटम इसमें वर्णित हैं. प्रशांत जी ने बताया कि हर छ महीने पर इस केटलॉग का नया संस्करण आ जाता है. डिजाइन की एक भारतीय और एक अमेरिकी टीमें परस्पर तालमेल से काम करती हैं. यहाँ वह टीम ऊपर की मंजिल पर स्थित थी. उनके पास मैं अपने घुटने के दर्द के कारण सीढ़ी चढ़ कर नहीं जा सका. पर निकट भविष्य में उनसे मिलने जानने का विचार अवश्य है.

डिजाइन केटलॉग की पुस्तकें

अब, जब अधिकांश भदोही के कार्पेट व्यवसायी या तो असफलताओं से थक चुके हैं या “विगत” हो चुके हैं और सूर्या कार्पेट्स जीवंत और प्रगति कर रहा है; तो सशक्त डिजाइन टीम उसके पीछे जरूर होगी. आज के और आने वाले समय में वही बचेगा और प्रगति करेगा, जिसके पास नया सोचने और प्रस्तुत करने की ऊर्जा और माद्दा होगा!

मुझे यू ट्यूब पर सूर्या कार्पेट्स के डिजाइन केटलॉग का यह वीडियो मिला. आप देखने का कष्ट करें.

कारखाना देखने के बाद हम सूर्य मणि जी से मिले. उन्होंने अपने दफ्तर के बाहर हमारा स्वागत किया. उनके दफ्तर में कुछ समय हल्की-फुल्की बातचीत हुई. फिर तिवारी जी ने सवेरे के नाश्ते का आमंत्रण दिया. पराठा सब्जी और मीठा मट्ठा. वैसा जैसा एक मध्य वित्त परिवार पौष्टिक नाश्ता होता है. मुझे ऊपर उधृत पुस्तक की पंक्तियाँ याद हो आईं. मिलियनेयर व्यक्ति नाश्ता सामान्य ही करते हैं – रोज शैम्पेन (अमरीकी रहन सहन मुताबिक) नहीं पीते. 😀

नाश्ता तिवारी जी के दफ्तर के पीछे के एक कमरे में था. तिवारी जी की इस कमरे में ही रिहाइश है. एक औसत आकर का कमरा जिसमें एक बिस्तर, सेंटर टेबल और एक सोफा के अलावा ज्यादा जगह नहीं बचती. कमरे में कोई कीमती डेकोरेशन नहीं है. कुछ पुस्तकें, एक टेलीविजन, च्यवन प्राश जैसी कुछ बोतलें और देवताओं के कुछ चित्र भर हैं. हमारे आपके कमरे और तिवारी जी के कमरे में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं होगा.

श्री सूर्य मणि तिवारी जी

उनका दफ्तर भी बहुत बड़ा नहीं. भारत सरकार के जूनियर प्रशानिक ग्रेड के अफसर उससे कहीं बड़े और चमक दमक वाले चेंबर में काम करते हैं. दफ्तर में एक लैंड लाइन (या इंटर कॉम) फोन, दो मोबाइल (शायद एप्पल, एंड्रॉयड नहीं) और लैपटॉप के स्थान पर एक टैब – यही यंत्र थे. यानि, धन और दफ्तर का चमकदार होना समानुपातिक नहीं हैं.

नाश्ते के बाद मैंने तिवारी जी का कुछ समय अपने काम की बातों को पूछने में लिया. उन्होंने बड़े स्पष्ट उत्तर दिये.

पहला पूछने का मुद्दा कार्पेट व्यवसाय की वर्तमान दशा और इस व्यवसाय में सफलता/असफलता को लेकर था.

सूर्य मणि जी ने बताया कि आवश्यकताओं के अनुसार knotted, tufted और kelim प्रकार के गलीचे और दरी बनाए गलीचा उद्योग ने. पर अधिकांश व्यवसायी उन्नत होती तकनीक के साथ तालमेल नहीं बना पाए. इलाके में तकनीशियनों की कमी एक बड़ा मुद्दा रही.

सूर्या ने अमेरिकन दफ्तर खोल कर अपने को निर्यातकों की कतार से अलग कर आयातक बनाया. इसका फायदा मिला. अन्य निर्यातक अपनी पूंजी के प्रबंधन को भी कुशलता से नहीं कर पाए. कुछ ने तो अपनी पूंजी अपने व्यसनों में गंवाई. व्यवसाय में चरित्र पर लगाम महत्वपूर्ण होता है…

प्रशांत तिवारी. वे हमें सूर्य मणि जी से मिलवाने ले कर गए थे और उन्होंने परिसर अच्छे से घुमा कर दिखाया.

पर अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं. अब तक जितनी तेजी से बदली उससे कहीं ज्यादा तेजी से. ई-कॉमर्स से तालमेल बिठाना और उससे प्रतिस्पर्धा करना सरल नहीं है. वालमार्ट जैसे उपक्रमों की आर्थिक क्षमता का मुकाबला करना है. यह चिंता का कारक है. इसके अलावा अपने प्रॉडक्ट्स का सतत इनोवेशन करते रहना बड़ा चैलेंज है.

इकहत्तर साल से अधिक उम्र के व्यवसायी, तथाकथित वानप्रस्थ की उम्र में, जिस प्रकार स्टेट ऑफ टेक्नॉलजी और मार्केट पर अपने विचार रख रहे थे, वह सुन कर अपने रिटायरमेन्ट पर मुझे संकोच होने लगा. सूर्यमणि जी की मानसिक ऊर्जा से इर्ष्या होने लगी.

मैंने विषय बदला.

उनके जीवन विवरण से लोग क्या सीख समझ सकते हैं?

तिवारी जी की बेझिझक सोच थी कि अगर वे अपने अतीत को व्यक्त करेंगे तो उसका ध्येय यही होगा – एक गरीब नौजवान यह समझे कि बढ़ोतरी के लिए सिल्वर स्पून की नहीं, कड़ी मेहनत की जरूरत है. कड़ी मेहनत, नम्र व्यवहार, ईमानदारी और ईश्वर कृपा से सफलता साधी जा सकती है. उसके लिए पूंजी का होना अनिवार्य शर्त नहीं है.

अगर वे अपने जीवन और पुरानी यादों को लोगों के सामने रखेंगे तो उसका ध्येय नौजवान पीढ़ी को यही प्रेरणा देना होगा. निश्चय ही वह कथन/लेखन नौजवान पीढ़ी को केंद्र में रख कर होगा.

समाज बदला है. आगे और तेजी से बदलेगा. पर जीवन के नैतिक मूल्य वही रहेंगे. शाश्वत. उस बदलाव को दर्ज करते हुए तिवारी जी अपने अतीत की बात करना चाहते हैं. शाश्वत मूल्यों की भी बात कहना चाहते हैं. पर यह अभिव्यक्त करने में उन्हें हड़बड़ी नहीं है. वे अभी भी कर्म क्षेत्र में हैं और समय की लगाम अपने हाथ में दृढ़ता से थामे हैं.

हमें विदा करते समय वे गेट तक आए और बोले – इस मुलाकात के बाद अब वे नित्य की कुकुर छिनौती में लग जाएंगे!

दिन भर की सघन कार्य की व्यस्तता का वे मजाकिया नाम देते हैं – कुकुर छिनौती. 😀

बड़ा रोचक और प्रेरणास्पद रहा सवेरे के समय सूर्य मणि जी से मिलना. आजकल बहुधा उनका फोन सवेरे साढ़े पांच बजे आता है. वे लोगों को पहचानने और जोड़ने में पारंगत हैं. यह सवेरे का फोन शायद उसी का हिस्सा है.

लगता है हम दो बेमेल लोगों – कर्मक्षेत्र की लगाम कस कर थामे 71+ वर्षीय वे और अपनी रिटायर्ड जिन्दगी की विरक्त आसक्ति (?!) में डूबा मैं – का संपर्क आगे बना रहेगा.

फोन पर श्री तिवारी

इस गांव, अंचल और प्रांत की खिन्नता

कभी कभी यह गांव, पूर्वांचल और प्रांत बहुत निराश करता है. 😳


ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स में भारत 110 वें नंबर पर है. अगर उत्तर प्रदेश एक अलग देश होता तो उसका स्थान 110 से कहीं नीचे होता.
शायद पाकिस्तान (रेंक 140) से भी नीचे. 🙁
सामंतवादी समाज, रंगदारी, लचर पुलिस और प्रशासन तथा उदासीन सी जनता – कभी कभी लगता है कि कहीं और बसना चाहिए था.

रेलवे की नौकरी का एक नफा है. व्यक्ति और परिवार लोकल झिक झिक से असंपृक्त aloof बना रह सकता है. उसकी अधिकांश जरूरतें रेल परिवार में पूरी हो जाती हैं.
पर, रिटायर होने पर, समाज और प्रांत देश की कमियां उजागर होने लगती हैं. उन्हे देख व्यक्ति, बावजूद इसके कि वह इसी समाज से निकला है, कभी कभी बहुत स्तब्ध, खिन्न और हताश होता है.
कभी कभी यह गांव, पूर्वांचल और प्रांत बहुत निराश करता है. 😳

CATO Human Freedom Index की 2018 की पुस्तिका का मुख पृष्ठ

राजकुमार उपाध्याय

राजकुमार जी से आमने सामने का कोई परिचय नहीं था. फिर भी उनके दुनियाँ के उस छोर शिकागो से आए फोन और उनके भाई जी के आ कर मिलने में आत्मीयता भरपूर झलकी. मैं उनके घर हो कर आया.


मेरे पिताजी भर्ती हैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर एंड हॉस्पिटल, औराई में. अस्पताल के बगल में चाय की एक गुमटी है. वहां मेरी पत्नीजी और मैं सवेरे सवेरे जाते हैं चाय पीने. सवेरे की पहली चाय में वह चीनी मिलाए, उससे पहले बिना चीनी की चाय मिलने की संभावना रहती है.

राजकुमार उपाध्याय और परिवार. चित्र फ़ेसबुक प्रोफाइल से.

खैर, मुद्दा यहां सवेरे की चाय का नहीं है. चाय की गुमटी के बगल में जो घर है वह उपाध्याय जी का है. उनके बारे में मुझे पता चलता है परिवार के बेटे राजकुमार उपाध्याय जी से. राजकुमार जी मेरे फेसबुक मित्र हैं. शिकागो में रहते हैं. उनके फेसबुक चित्रों से लगता है उनकी पत्नी और दो बच्चे रहते हैं उनके साथ.

राजकुमार जी सोशल मीडिया पर यह जान कि मैं पिताजी की अस्वस्थता के कारण इस अस्पताल में हूँ; मुझसे शिकागो से बात की. उसके बाद अपने भाई मनोज जी को मेरे पास अस्पताल में भेजा. किसी भी प्रकार की कोई सहायता की आवश्यकता जानने टटोलने के ध्येय से.

सोशल मीडिया की यह असल ताकत है. दुनिया के दूसरे छोर के लोग अगर आपके कहे/लिखे से प्रभावित होते हैं तो एक प्रकार से आपसे जुड़ते हैं. वह नेटवर्किंग करिश्माई होती है पुराने मानकों से. फेसबुक ट्विटर, इनस्टाग्राम और ह्वात्सेप्प आदि ने सम्बंधों की एक नयी विमा (नया डायमेंशन) सृजित कर दिया है.

आप जहां से तनिक अपेक्षा नहीं करते, वहां से सहायता अवतरित होती है. वर्ना, आसपास के कई अंतरंग (?) भी मुंह चुराते पाए जाते हैं, गाढ़े समय में.

राजकुमार जी से आमने सामने का कोई परिचय नहीं था. फिर भी उनके फोन और उनके भाई जी के आने मिलने में आत्मीयता भरपूर झलकी. मैं उनके घर हो कर आया. उनके पिताजी का कोयले और लकड़ी का व्यवसाय है. उनके मां पिताजी – दोनों ही बहुत प्रेम और सहजता से मिले. माँ जी बहुत अच्छी चाय बना कर लाईं. मध्य वित्त परिवार. लगा कि लगभग सेमी रिटायर्ड लाइफ जी रहे हैं उपाध्याय दम्पति. सुखी जीवन. पिताजी ने अपने घुटने के ऑपरेशन की बात बताई. अपने बेटे से बहुत प्रसन्न, बहुत संतृप्त लेगे उपाध्याय जी.

उनकी माँ जी ने कहा कि अपना ही घर समझूँ और कोई आवश्यकता हो, देर सबेर चाय की जरूरत हो तो वे बना कर अस्पताल भिजवा सकती हैं. यह सुनना ही बहुत सुकून वाला होता है.

उनके घर से लौटा तो दस दिन की थकान के बावजूद आत्मीयता से रीचार्ज हो कर लौटा.

आत्मीयता बरास्ते सोशल मीडिया बहुत अच्छा अनुभव था.

कितना विचित्र है – दुनियाँ तकनीकी परिवर्तन से पास आ रही है और पड़ोस जो पूर्व परिचित था, वह शुष्क होता जा रहा है!

(राज कुमार उपाध्याय और उनके परिवार के चित्र उनकी फेसबुक प्रोफाइल से. अन्यथा उनसे फेस टू फेस मुलाकात नहीं हुई है)


ऋतम बोस

बोस जी जैसे लोग किसी भी संस्थान के लिए एसेट होते हैं.


ये ऋतम बोस हैं. सूर्या ट्रॉमा सेंटर के प्रबंधक. अकेले रहते हैं इस लिए चौबीस में चौदह घंटे अस्पताल के काम में समस्याएं सुलझाते, प्रबंधन करते और मरीजों – ग्राहकों से बोल बतियाते, फीडबैक लेते दिख जाते हैं.

बंगाली हैं – हावड़ा के सुसंस्कार युक्त बंगाली.

यहाँ धुर पूर्वांचल के #गांवदेहात में कैसे आए?
“झारखंड के देवघर में पढ़ाई की. वहां से बनारस आया और फिर यहां औराई में.” बोस जी ने विस्तार से नहीं बताया. पर शायद सूर्या ट्रॉमा सेंटर को उनकी और उनको इस सेंटर की जरूरत थी. दोनों परस्पर कम्पैटिबल हैं.

हल्के में बोस जी ने जोड़ा – “बंगाली कहाँ नहीं हैं, सर. बंगालीज आर एवरीह्वेयर! 😊” सही कहते हैं. बोकारो में मेरी बिटिया दामाद के घर का अस्पताल है. वहां भी अस्पताल के प्रबंधक हैं बनर्जी दादा. बसक नाथ बनर्जी. बंगाली. वे भी अपने काम के लिए 200 पर्सेंट समर्पित हैं, ऋतम बोस जी की तरह.

मुझे यहां कोई समस्या हो, उसके विघ्न हरण के लिए बोस जी का नाम सुझाया गया. यहां आते ही पिताजी के आईसीयू में होने के कारण मुझे एक कमरे की आवश्यकता थी. बोस जी ने अस्पताल के नियमों की प्रतिबद्धता का निर्वहन करते हुए भी कोई न कोई तरीका निकाल लिया और यहां एक कमरा मिल गया.

मैं बहुत से मरीजों की समस्याओं का समाधान करते देखता हूँ बोस जी को. हर समय उन्हें अस्पताल के चक्कर लगाते ही देखा है. उनके अपने दफ्तर में बैठे तो कभी कभार ही देखा है.

बोस जी जैसे लोग किसी भी संस्थान के लिए एसेट होते हैं.

ऋतम बोस, प्रबंधक, सूर्या ट्रॉमा सेंटर

स्वर्ण प्राशन – आयुर्वेदिक वैक्सीनेशन पद्धति और तिवारी दंपति का अभियान

बच्चों के ये डाक्टर दंपति इस स्वर्ण प्राशन की दवा को बहुत कारगर पा रहे थे, इसलिए इसे अभियान के रूप में अपनाने का संकल्प लिया. अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁



वे दोनों डाक्टर हैं. एक एलोपैथी के – डा. संतोष तिवारी. बच्चों के डाक्टर हैं और सूर्या ट्रॉमा सेंटर में वरिष्ठ कंसल्टेंट हैं. उनकी पत्नी हैं डा. शर्मिला तिवारी. वे आयुर्वेद की डाक्टर हैं – बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी. दोनों में प्रोफेशनल तरीके से छत्तीस का आंकड़ा होना चाहिए. मैंने पहले किसी एलोपैथी वाले और आयुर्वेदिक डाक्टर में हार्मोनी नहीं देखी. ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास “आरोग्य निकेतन” इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों के झगड़े की पृष्टभूमि में लिखी गई कालजयी रचना है.

पर इस दम्पति ने यह अलग विधाओं का झगड़ा मिटा दिया है. और उसमें आयुर्वेद विनर है. दोनों पति पत्नी स्वर्ण प्राशन नामक आयुर्वेदिक इम्यूनोलॉजिकल सिस्टम की उपयोगिता पर न केवल सहमत हैं वरन उसके प्रचार प्रसार के लिए अपनी बहुत सी ऊर्जा लगा रहे हैं.

डा. संतोष से मैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर (जहां आजकल अपने पिताजी के इलाज के सन्दर्भ में हूँ) में मिला. वे स्वर्ण प्राशन के कॉन्सेप्ट से परिचित थे पर आयुर्वेदिक पद्धति का होने के कारण उस पर ध्यान नहीं दिया था. जब अपनी बिरादरी के डाक्टरों की एक कांफ्रेंस में इसकी एक सज्जन ने चर्चा की तो इस भारतीय विरासत की ओर उनका रुझान बना.

काफी जांच परख के बाद संतुष्ट होकर, संतोष और शर्मिला जी ने वाराणसी में अपने सूर्या चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के माध्यम से, इस इम्यूनोलॉजिकल प्रणाली को बतौर अभियान अपनाने का निश्चय किया.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी. उनका वाराणसी स्थित चिल्ड्रन अस्पताल

स्वर्ण प्राशन के बारे में मैंने अपने उज्जैन के आयुर्वेद के पीएचडी मित्र डा. प्रज्ञान त्रिपाठी से भी पता किया. उन्होंने भी सहमति व्यक्त की कि यह प्राचीन पद्धति है. मनुष्य के 16 संस्कारों में इसे स्थान दिया गया है. आयुर्वेद के अनुसार राजा का यह कर्तव्य होता था कि वह राज वैद्य की देख रेख में स्वर्ण भस्म का उत्पादन कराये. राज वैद्य राज्य के 16 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को पुष्य नक्षत्र के दिन (27 दिन में एक बार आने वाला दिन) यह भस्म चटाया करते थे. 16 वर्ष की उम्र तक 24 खुराक हर बच्चे को देने का विधान था. इसके दिए जाने पर बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती थी और उसकी मेधा शक्ति का विकास होता था.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी ने 2017 में अपने अस्पताल में इस भस्म को बच्चों को देने का कार्यक्रम प्रारंभ किया. 13 जनवरी 2017 के दिन 100 के लगभग बच्चे पंजीकृत थे यह दवा देने के लिए, पर आए 173. उनको स्वर्ण भस्म घी में मिश्रित कर चटाई गई. बच्चों की संख्या बढ़ती गयी और तिवारी दंपति का उत्साहवर्धन भी होता गया इस अभियान में. आज इस दवा के लिए 1600 बच्चे पंजीकृत हैं. ये मुख्यतः उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग और बिहार के बच्चे हैं.

शुरू में अभियान के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने विज्ञापन का भी सहारा लिया. कालांतर में दवा की उपयोगिता लोगों को स्वयं समझ में आने लगी.

डा. संतोष तिवारी ने मुझे बताया कि यह दवा धूतपापेश्वर नामक आयुर्वेदिक कम्पनी बनाती है. वेब सर्च में पता चलता है कि यह ऑनलाइन भी उपलब्ध है. पर इस दवा को बच्चे को देने का भी एक विधान है. यह घी में मिश्रित कर चटाई जाती है पुष्य नक्षत्र के दिन.

तिवारी दंपति स्वर्ण भस्म धूतपापेश्वर से लेते हैं और ब्राह्मीघृत नागार्जुन औषधालय से. पुष्य नक्षत्र के दिन जितने बच्चे आने वाले हों, उनके अनुपात में इन दोनों दवाओं का मिश्रण कर टाइट्रेशन किया जाता है. उससे प्राप्त औषधि 1 से 4 मिलीलीटर मात्रा में प्रत्येक बच्चे को चटाई जाती है.

आप डा. शर्मिला तिवारी के एक वीडियो 👇 को देखने का कष्ट करें.



यह अभियान कितना कारगर है?

डा. संतोष ने बताया कि बहुत कारगर पाया है उन्होंने इसको अपने प्रयोगों में. जौनपुर की एक महिला जो अपने सभी बच्चों को इस इम्यूनाईजेशन के लिए लायी थी ने 6 खुराक के बाद बताया कि उसके बच्चे जो महीने में 26 दिन बीमार रहते थे अब दवा के लिए बीमार दशा में नहीं, पिकनिक मनाने आते हैं. कई बच्चों की इनहेलर की दरकार खत्म हो गई. इस दवा के द्वारा इम्यून हुए 1 हजार बच्चों में केवल 5 ही डेंगू ज्वर से पीड़ित हुए और उनमें से किसी को भी अस्पताल नहीं भर्ती करना पड़ा. स्वॉइन फ्लू के कोई मामले नहीं आए इस दवा से इम्यून किए बच्चों में.

और असल फायदा तो तराई के इलाके में हुआ. गोरखपुर और उसके आसपास, जहां एनसेफलाइटिस के कारण बहुत से बच्चों की अकाल मृत्यु हुई थी, के स्वर्ण प्राशन दवा से इम्यून हुए बच्चों में एनसेफलाइटिस का एक भी मामला नहीं पाया गया.

इम्यूनिटी के लाभों के अलावा बच्चे की मेधा, एकाग्रता, जिज्ञासा और ग्रहण की बेहतर क्षमता की बातें उनके अभिभावकों ने बताई हैं. डिस्लेक्सिया ग्रस्त बच्चों का रिस्पॉन्स भी बेहतर हुआ है.

तिवारी दंपति का सूर्या चिल्ड्रन अस्पताल. गुब्बारे और छोटा भीम चिकित्सा का अंग हैं. 😊 चित्र नेट से कॉपी किया गया

डा. संतोष के चेहरे पर अपने इस जुनूनी अभियान की सफ़लता को लेकर आत्म संतोष था. उनके चेहरे की चमक ही बता रही थी कि बच्चों के ये डाक्टर इस दवा को बच्चों के लिए कितना कारगर पा रहे थे.

अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁


डा. प्रज्ञान ने मुझे बताया कि मध्यप्रदेश में स्वर्ण प्राशन संस्कार का टीकाकरण व्यापक हो रहा है.

डा. संतोष भी कहते हैं कि योगी सरकार भी रुचि ले रही है. उत्तर प्रदेश में भी इसे सरकारी स्वास्थ कार्यक्रम में शमिल करने की संभावनाएं हैं….

वैसे भी, यह विधा भाजपा के राजनैतिक दर्शन और सामजिक सोच के साथ पटरी खाती है.

भविष्य में इस विधा पर ज्यादा सुनने को मिलेगा, यह संभावना है.


अंत की आहट उदास करती है

डाक्टर कह रहे हैं आप कोई मिरेकल की उम्मीद न करें. अस्पताल में रखेंगे तो हम लोग केयर करेंगे ही, पर वह केयर घर में भी की जा सकती है. कुल मिलाकर वे हमें जबरी जाने को नहीं कह रहे, पर सुझाव दे रहे हैं कि यहां समय गुजरना फायदेमंद नहीं.



पिताजी को सूर्या ट्रॉमा सेंटर के लोग परसों दोपहर MRI के लिए लेकर गए. पांच छ लोगों ने बड़े संभाल कर बिस्तर से स्ट्रेचर और स्ट्रेचर से एम्बुलेंस में शिफ्ट किया. मेरी पत्नीजी उन्हें उठाने लिटाने में हाथ बटा रही थीं पर मैं तो साथ में खड़ा भर था. एक चित्र भी लिया. एक कर्मी को अजीब सा लगा कि इस अवसर पर भी चित्र लेने की सूझ रही है इस बेटे को.

एक कर्मी को अजीब सा लगा कि इस अवसर पर भी चित्र लेने की सूझ रही है इस बेटे को

मेरी बिटिया कहती है कि मेरे इमोशंस और मेरी चारित्रिक टफ-नेस अलग तरह की है. शायद वह सही हो.

एम आर आई के कक्ष में पिताजी के साथ चेंबर में मुझे बैठने को कहा गया. मशीन की कर्कश खट खट चख चख किट किट की ध्वनि के बीच मैं अपने बचपन से अब तक की मेमोरी लेन में चला गया. माँ के रहते पिता का रोल निभाते पिताजी की याद और अब मां के बाद पिता कम मां ज्यादा के रोल में पिताजी के साथ जीवन का स्मरण होता गया.

वह समय याद है कि एक बार यात्रा से मेरे वापस लौटने पर पिताजी ने सिर पर हाथ रखा और उसके बाद मेरे पूरे मुंह पर हाथ फेरा – वैसे जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को करती है.

मेरे घुटनों और पैर के तलवों में दर्द रहता है. लगभग हर रोज पिताजी मेरे पास बैठ कर मुझे सहलाते थे. पूछते थे कि दर्द कुछ कम हुआ? दर्द वास्तव में गायब हो जाता था… कुछ लोग कह सकते हैं कि पचासी साल के पिता से सेवा ले रहा है यह 64 साल का व्यक्ति. लेकिन वे समझ नहीं सकते कि सीन वह नहीं जो दिख रहा है. असल सीन है कि एक छोटे बच्चे के हाथ पैर उसकी मां सहला रही है.

पिछले दो महीने से उनकी अस्वस्थता के कारण वह सहलाना बंद है. आगे कभी होगा भी या नहीं – वह भी तय नहीं है. आई सी यू में लेटे उनके हाथ पैर छाती और मुंह सहलाता हूँ. लगता है मेरी आँखों की टियर डक्टस् ब्लॉक हो गई हैं. उसमें पानी ठीक से पास नहीं होता है आजकल.

आईसीयू के बेड पर पिताजी.

डाक्टर कह रहे हैं आप कोई मिरेकल की उम्मीद न करें. अस्पताल में रखेंगे तो हम लोग केयर करेंगे ही, पर वह केयर घर में भी की जा सकती है. कुल मिलाकर वे हमें जबरी जाने को नहीं कह रहे, पर सुझाव दे रहे हैं कि यहां समय गुजरना फायदेमंद नहीं. घर का वातावरण बेहतर रहेगा.

यूँ ही स्टेबल रहा तो कल तक हम घर ले जाएंगे पिताजी को. मन में वही चल रहा है कि कैसे खिलाएं, नहलाऐं, घुमाएं फिरायेंगे. ह्वील चेयर लेना होगा. सर्दियों के लिए कमरे का तापक्रम ठीक रखने के लिए उपकरण लगाने होंगे. फीडिंग की कैलोरी और मेन्यू बनाना होगा. कोशिश रहेगी कि जितना आरामदायक वातावरण दे सकें, वह नियोजित हो जाए.

यह सब सोचने में समय कट रहा है. पर बीच बीच में पिताजी के अंत की आहट भी होती है. मां और पिता दोनों को खोना बड़ा भयावह एहसास है. छटपटाहट होती है.

लगता है कोई सिर दबा दे. पैर सहला दे. पत्नीजी को कहता हूँ. वे करती हैं. पर पिताजी के हल्के पर सधे स्पर्श की याद बनी रहती है.

शाम का समय. रोशनी कम हो रही है बाहर. दिन बीत रहा है. दिवस के अंत की आहट उदास कर जाती है.

एक बार फिर उठ कर आई सी यू में लेटे पिताजी को देख आता हूँ. आंखे मूंदे वे छोटी गौरैया या बीमार मुनिया की तरह पड़े हैं.

अंत की आहट…