जंगल की वनस्पतियों पर शोध ग्रंथ


"विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।
“विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।

मैने श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से उनके शोध कार्यों पर लिखी उनकी पुस्तकों पर जिज्ञासा जताई थी।

कुछ दिनों बाद मुझे एक अनजान नम्बर से फोन आया। बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के सेण्ट्रल रीजनल सेण्टर, इलाहाबाद से श्री अर्जुन तिवारी फोन पर थे। उन्होने बताया कि कुछ समय बाद वे अपने विन्ध्य की वनस्पतियों पर अध्ययन वाली पुस्तक मुझे भिजवा देंगे।

लगभग 15 दिन बाद वह पुस्तक मेरे हाथ में थी।

मेरा सोचना था कि यह लगभग 50-100 पेज की कोई पुस्तिका होगी। ऐसी पुस्तिका, जो लोग कम से कम मेहनत में लिखते-छपवाते हैं कि लेखक होने का नाम भर हो जाये और कहने को हो कि वे शोध कर सामग्री पब्लिश कर चुके हैं। ऐसी पुस्तकें लोगों पर रुआब डालने भर का काम करती हैं।

पर यह पुस्तक – विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान – एक पुस्तिका नहीं, ए-4 साइज बड़े आकार के 400 से अधिक पेजों का भारी भरकम शोध ग्रन्थ निकला। छ व्यक्तियों के कई वर्षों की जंगल छानने, पारम्परिक चिकित्सकों के मिलने, नोट्स बनाने और वनस्पतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का नतीजा था। यह पुस्तक तो आगे आने वाले चिकित्सकीय शोध के कई अध्यायों को ट्रिगर कर सकती है।


महुआ बड़ा मिठहुआ भाई
लाटा, ड़ोभरी खा बनाई
भुरकुन्ना खुरमा डोभराऊरा
खा रसखीर मौहारी भउरा
येखे फर का तेल निकारी
यामा न घाले कोउ कुल्हारी।
महुआ कितना मीठा पदार्थ है कि इससे लाटा, डोभरी भुरकुन्ना, सुरमा रसखीर, गौहारी आदि तरह तरह के व्यंजनों को बना कर खाया जाता है। इसके फल से तेल भी निकलता है। इस लिये ऐसे उपकारी पेड़ को कोई कुल्हाड़ी न चलाये।

(पुस्तक से)


पुस्तक की एक् प्लेट
पुस्तक की एक् प्लेट

वनवासी वे हैं, जो अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिये वन पर निर्भर हैं। निर्भर हैं तो वन के प्रति उनमें माता-पिता जैसा भाव है। वृक्षों के प्रति आदर। उनका रहन-सहन, भोजन, दवा-दारू, देवी-देवता सब का आधार वन है। जंगल का वे आवश्यकता से अधिक दोहन/शोषण नहीं करते।

पुस्तक में यह और वन से सम्बन्धित अनेकानेक जानकारियां; अनेकानेक आयाम स्पष्ट होते हैं। यह सर्राटे से पढ़ी जा सकने लायक पुस्तक नहीं है। सन्दर्भ-ग्रंथ है; जिसपर बार बार लौटा जाये।

यह पुस्तक रीवां सम्भाग के रींवा, सतना, शहडोल, अनूपपुर, सीधी और उमरिया जिलों के वनो के जैवविविधता बहुल 22 क्षेत्रों के दो वर्षों तक सघन भ्रमण, स्थानीय जानकारों और पारम्परिक चिकित्सकों से सम्पर्क से निकली संतृप्त जानकारी का संग्रह है। इसमें दो सौ से अधिक स्थानीय जानकारों, वैद्यों, वन कर्मियों आदि की सूची है जिनके साथ सम्पर्क से इस पुस्तक की सामग्री बनी है। बड़े ही वैज्ञानिक तरह से अध्ययन किया गया है, इस ग्रंथ के लिये।

इस पुस्तक पर छ लेखकों के नाम हैं। सर्वश्री प्रवीण चन्द्र दुबे, के के खन्ना, आरएलएस सिकरवार, आरएन सक्सेना, बीएल पाण्डेय और अर्जुन प्रसाद तिवारी। इनमें से मैं श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से मिला हूं। और अर्जुन तिवारी से फोन पर चर्चा हुई है। अन्य सज्जनों से भी मुलाकात की इच्छा है।

इस ब्लॉग पोस्ट में पुस्तक की सामग्री परिचय के बारे में अगर मैं कहना शुरू करूं तो उसे 500-1000 शब्दों में समेट नहीं सकता। अत: उसका प्रयास नहीं करूंगा। प्रवीण जी और अर्जुन ने मुझे यह भरोसा दिया है कि इस पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध करा देंगे। तब, जब भी समय मिला, मैं इसके अंशों से आप पाठकगणों को जानकारी देता रहूंगा।

फिलहाल तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि अत्यंत प्रभावित हूं इस अध्ययन-सन्दर्भ-ग्रंथ से।


अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।
अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।

मैने अर्जुन तिवारी से फोन पर बातचीत की। वे बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के इलाहाबाद केन्द्र में शोध कार्य कर रहे हैं। [ प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने मुझे फोन पर कहा था – बड़ा ही अच्छा लड़का है। इसके लिये कोई अच्छी लड़की हो तो बताइयेगा! 😆 ]

अर्जुन से मैने पूछा कि जितना पारम्परिक ज्ञान उन्होने अनेक जनजातीय लोगों/वैद्यों/जानकारों से एकत्र किया है, उसमें से कितना, बकौल उनके, आयुर्वेद ने अपने में समाहित किया है?

अर्जुन का विचार था कि अभी बहुत कुछ वैज्ञानिक/आयुर्वेदीय अध्ययन बाकी है। लगभग 40 प्रतिशत ज्ञान किसी न किसी तरह से आयुर्वेदीय औषधियों-पद्धतियों में है। एलोपैथिक दवाओं में भी बहुत सी का मूल ये जड़ी-बूटियां ही हैं। पर बहुत से वनस्पतीय-पारम्परिक ज्ञान का वैलीडेशन होना शेष है। उस दिशा में बहुत प्रयास नहीं हुये हैं। पर अब आयुष मंत्रालय की स्थापना हुई है तो आशा की किरण नजर आती है।

उदाहरण के लिये अर्जुन ने बताया कि जनजातीय लोग भस्म-कन्द नामक जड़ी का प्रयोग केंसर के लिये करते आये हैं। उज्जैन में एक बीएमएस डाक्टर से उन्हे प्रवीण जी ने मिलवाया था। उन डाक्टर साहब ने  बताया था कि भस्म-कन्द का सफल प्रयोग उन्होने कई केंसर रोगियों पर किया था।

पर जन जातीय लोग भस्म-कन्द का सूरन के विकल्प के रूप में अपने भोजन में प्रयोग करते आये हैं। व्यापक दोहन हो चुका है इस वनस्पति का और यह एंडेंजर्ड प्रजाति में आ गयी है। इसको बनाये रखने के प्रयास की आवश्यकता है।

अर्जुन ने एलोपैथी और आयुर्वैदिक दवाओं में वनस्पति के प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किये। एलोपैथी में वनस्पति का संश्लेषित रूप प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक औषधि में वनस्पति अपनी मूल दशा में रहती है। भारत में आयुर्वेदिक दवाओं की मूल समस्या उनमें कठोर क्वालिटी कण्ट्रोल का न होना है। उनकी फार्मास्युटिकल कम्पनियां जड़ी-बूटियों की गुणवत्ता से समझौता करती हैं। (उदाहरण के लिये अशोकारिष्ट में वे अशोक के उस प्रकार का प्रयोग कर रही हैं, जिसमें औषधीय गुण नगण्य़ हैं।) कई बार पुरानी जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर लिया जाता है। वे कुशल प्लाण्ट टेक्सोनॉमिस्ट अपनी दवाओं के उत्पादन में नहीं रखतीं।

'विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक का एक पेज-अंश
‘विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक का एक पेज-अंश

अर्जुन तिवारी से बातचीत कर मुझे लगा कि वनस्पतियों के पारम्परिक ज्ञान का अध्ययन और उसका आयुर्वेद/एलोपैथ के साथ सही संश्लेषण समय की मांग भी है और वर्तमान सरकार की सोच के अनुसार एक महत्वपूर्ण घटक भी – जनता के स्वास्थ्य के लिये।

अर्जुन निकट भविष्य में वैज्ञानिक पद के लिये चयन में जायेंगे। उन्हे शुभकामनायें!


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आप एक बार लिखकर कितनी बार मिटाते या उसे सुधारते हैं?



altबात वर्ष १९९७ की है जब मैं भीतरकनिका अभ्यारण्य के एक प्रोजेक्ट में शोध सहायक का साक्षात्कार देने के लिए कटक गया था| कम उम्र में इतनी अधिक अकादमिक उपलब्धी को देखकर चयनकर्ता अभिभूत थे| वे हां कहने ही वाले थे कि एक वरिष्ठ चयनकर्ता ने यह प्रश्न दागा|

“एक बार भी नहीं| जो भी लिखता हूँ उसे अंतिम मानकर लिखता हूँ| सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता|” मेरे उत्तर से स्तब्धता छा गयी|

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बरसात, सांप और सावधानी



snake_simple बरसात का मौसम बस अब दस्तक देने ही वाला है। नाना प्रकार के साँपो के दस्तक देने का समय भी पास आ रहा है। शहरी कालोनियाँ जो खेतो को पाटकर बनी हैं या जंगल से सटे गाँवो में साँप घरो के अन्दर अक्सर आ जाते है। वैसे तो बिलों मे पानी भरने और उमस से बैचेन साँपो का आगमन कहीं भी हो सकता है। मुझे मालूम है कि आम लोगो को इसके बारे मे कितनी भी जानकारी दे दो, कि सभी साँप हानिकारक नही होते, पर फिर भी वे घर मे साँप देखते ही बन्दरो की तरह उछल-कूद करने लगते है। आनन-फानन मे डंडे उठा लेते हैं या बाहर जा रहे व्यक्ति को बुलवाकर साँपो को मार कर ही चैन लेते हैं।

Pankaj A


यह अतिथि पोस्ट श्री पंकज अवधिया की है। पंकज अवधिया जी के कुछ सांप विषयक लेखों के लिंक:

पन्द्रह मे से वे दो नाग जिनके सानिध्य मे हम बैठे थे।

नागिन बेल जिसे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

नागिन बेल के तनो को भी साँप भगाने वाला कहा जाता है।

ये असली नही बल्कि जडो को छिल कर बनाये गये साँप है। इन्हे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

ऐसा काटता है क्रोधित नाग|

दंश के तुरंत बाद|

नाग दंश से अपनी अंगुली खो चुके उडीसा के पारम्परिक चिकित्सक

साँपो पर कुछ शोध आलेख – एक और दो

साँपो पर मेरे कुछ हिन्दी लेख

भारत के कुछ विषैले और विषहीन सर्प

आम लोगो के इस भय का लाभ जडी-बूटी के व्यापारी उठाते हैं। साँप की तरह दिखने वाली बहुत सी वनस्पतियों को यह बताकर बेचा जाता है कि इन्हे घर मे रखने से साँप नही आता है। आम लोग उनकी बातो मे आ जाते हैं। मीडिया भी इस भयादोहन मे साथ होता है। जंगलो से बहुत सी दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ इसी माँग के कारण खत्म होती जा रही हैं। साँप घर मे रखी इन जड़ी-बूटियों के बावजूद मजे से आते हैं। यहाँ तक कि इन्हे साँप के सामने रख दो तो भी वे इनके ऊपर से निकल जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जडी-बूटियाँ व्यर्थ जाती हैं। केवल भयादोहन करके व्यापारी लाभ कमाते हैं।

बरसात के शुरु होते ही कुछ सुरक्षात्मक उपाय अपनाकर आप साँपो के अवाँछित प्रवेश पर अंकुश लगा सकते हैं। उन सम्भावित प्रवेश द्वारों पर जहाँ से साँप के अन्दर आने की सम्भावना है, दिन मे एक बार फिनाइल का पोछा लगा दें। साँप वहाँ फटकेंगे भी नहीं। कैरोसीन का भी प्रयोग लाभकारी है। यदि आपके घर के सामने लान है तो बरसात के दौरान इसे बेतरतीब ढंग से उगने न दें।

यदि साँप विशेषकर नाग जैसे जहरीले साँप आ भी जायें तो अनावश्यक उछल-कूद न मचायें। उन्हे उत्तेजित न करें। आप उनके सामने खूब जोर से बात भले करें पर हिले-डुले नहीं। वह आपको काटने नही आया है। यदि वह फन काढ़ ले तो आप स्थिर रहें। थोडी देर मे वह दुबक कर कोने या आड मे चला जायेगा। फिर उसे बाहर का रास्ता दिखा दें। कमरे मे जिस ओर आप उसे नही जाने देना चाहते हैं उस ओर फिनायल डाल दें। यदि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाये तो आस-पास पडे कपड़े नाग के ऊपर डाल दें। ताकि गुस्से मे दो से तीन बार वह कपडो को डंस ले। ऐसा करने से आप सम्भावित खतरे से बच जायेंगे। आमतौर पर कपडे डालने से वह शांत भी हो जायेगा। कोशिश करें कि आप इस बार एक भी साँप न मारें। साँप को दूर छोडने पर वह फिर वहीं नही आयेगा।

कुछ वर्ष पहले तक दुनियां मे शायद ही कोई व्यक्ति रहा हो जो साँप से मेरी तरह घबराता रहा हो। पिछले साल कुछ घंटो पहले पकड़े गये पन्द्रह से अधिक नागों के बीच एक कमरे मे हम पाँच लोग बैठे रहे। किसी का भी जहर नही निकाला गया था। निकटतम अस्पताल चार घंटे की दूरी पर था। एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ से हम सर्प प्रबन्धन के गुर सीख रहे थे। हमे हिलने-डुलने से मना किया गया था। हम बोल सकते थे पर हिल नही सकते थे। जरा-सा भी हिलने से साँप हमारी ओर का रुख कर लेते थे। उन्हे खतरा लगता था। जब वे शांत हो गये तो हमारे स्थिर शरीर के ऊपर से होकर कोने मे चले गये। नंगे बदन पर साँपो का चलना सचमुच रोमांचक अनुभव रहा। पर इससे साँपो को समझने का अवसर मिला। फिल्मो में साँपो की जो खलनायकीय छवि बना दी गयी है, वह साँपो की अकाल मौत के लिये काफी हद तक जिम्मेदार है।

पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है। 


गाज किसपर गिरेगी?



कुछ समय पहले मै खुडमुडी गाँव के श्री नगेसर से बात कर रहा था। उसे हम लोग बचपन ही से जानते हैं। मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वाला नगेसर अपने गठीले बदन के कारण गाँव मे लोकप्रिय रहा। इस बार वह एकदम बदल गया था। दो साल पहले जब वह बरसात के दिनो मे अपने दो साथियो खेत से लौट रहा था तभी बिजली गिर गयी। उसके दो साथी वहीं पर मर गये। नगेसर को ज्यादा शारीरिक क्षति नही हुयी पर मन से वह पूरी तरह खोखला हो गया।

ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता है। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।


Pankaj A श्री पंकज अवधिया का लेख। आप उनके लेख पंकज अवधिया लेबल सर्च में देख सकते हैं।

शरीर का कुछ भाग काला पड गया। मुझसे उसे जडी-बूटी की उम्मीद थी। मैने उसे परसा (पलाश) की लकडी दी और उसका पानी पीने को कहा। मैने उसे कुछ हर्बल मालाएँ भी दी। मुझे मालूम है कि ये जडी-बूटियाँ उसे बाहर से ठीक कर देंगी लेकिन मन की पीडा को वह आजीवन भोगता रहेगा।

बचपन मे घर के पास एक नीम के पेड़ पर बिजली (गाज) गिरी थी। उस चमक से डरकर मै कुछ समय के लिये बेसुध हो गया था। तब से मुझे आसमानी बिजली के कड़कने के समय बहुत भय लगता है। होम्योपैथी मे फास्फोरिकम नामक दवा के मरीज को तूफानो से बहुत डर लगता है मेरी तरह।

शहरो मे विभिन्न उपाय अपना कर हम आसमानी बिजली से काफी हद तक बच जाते है पर हमारे किसान बरसात मे खुले मे खेतों मे काम करते है। पानी से भरे धान के खेत आसमानी बिजली को आमंत्रित करने मे कोई कसर नही छोडते हैं। हर साल अनगिनत किसान और खेतीहर मजदूर आसमानी बिजली के गिरने से बेमौत मारे जाते हैं। उनके पास सुरक्षा के कोई कारगर उपाय नही है।

Farmer_in_Vietnamइस वियतनामी किसान को देखें। जो सिर पर बांस की छीलन से बनी दउरी पहने है, वह खुमरी सा है। उसके दोनो हाथ काम करने को मुक्त हैं। फोटो विकीमेडिया से

लोहे की डंडी वाले छाते आसमानी बिजली को आमंत्रित कर सकते हैं। पर यह संतोष की बात है कि ज्यादातर किसान अभी भी बाँस से बनी खुमरी (यह लिंक देखें) का प्रयोग करते हैं। खुमरी के कारण उनके दोनो हाथ काम करने के लिये स्वतंत्र होते हैं। किसान पेड़ों की शरण लेते हैं। यह जानते हुये भी कि बरसात के दिनो मे पेड़ों की शरण घातक सिद्ध हो सकती है।

क्या कोई विशेष पेड है जिस पर बिजली ज्यादा गिरती है? आप भले ही इस प्रश्न पर हँसे पर छत्तीसगढ के लोग महुआ, अर्जुन और मुनगा (सहजन) का नाम लेते है। उनका यह अनुभव विज्ञान सम्मत भी है। वैज्ञानिक शोध सन्दर्भ बताते है कि ऐसे बडे पेड़ जिनकी जड़ें भूमिगत जल तक पहुँचती हैं, उन पर बिजली गिरने की सम्भावना अधिक होती है। हमारे यहाँ 50-60 फीट गहरा कुँआ खोदने वाले कुछ तमिलनाडु के लोग हैं। वे उन पेड़ों के पास कुँआ खोदने के लिये तैयार हो जाते है जिन पर बिजली गिरी होती है। ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता हैं। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।

यदि आप खुली जगह मे हैं तो मौसम खराब होते ही झुककर बैठ जायें। झुककर बैठने का उद्देश्य सतह पर दूसरी चीजो की तुलना मे अपनी ऊँचाई कम करना है ताकि बिजली आप पर गिरने की बजाय ऊँची चीज पर गिरे। फैराडे के किसी नियम के अनुसार बन्द बक्सों मे बिजली नही गिरती है। यही कारण है कि गाड़ियों मे बिजली नही गिरती। पर किसान के लिये झुककर बैठना सम्भव नही है। आखिर वह कब तक बैठा रहेगा। खेतो के पास यदि सस्ते मे बन्द बाक्स बना दिये जाये तो भी किसान अन्दर नही बैठ सकता। यह व्यवहारिक उपाय नही है।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ कहते है कि तुलसी की माला बिजली से शरीर की रक्षा करती है। यह भी कि जिस पर बिजली गिरी हो उसे तुलसी की माला पहननी चाहिये। दूसरी बात मुझे सही लगती है। मै ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ। तुलसी की माला पहनने से बिजली नही गिरेगी – इसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे परखना जरुरी लगता है।

पारम्परिक चिकित्सको के लिये जंगली पेडो पर बिजली गिरना किसी वरदान से कम नही है। जितनी जल्दी हो सके वे प्रभावित पेड तक पहुँचते है और लकडी एकत्र कर लेते है। इस लकडी का प्रयोग असाध्य रोगों की चिकित्सा मे होता है। इस पर आधारित एक लेख आप यहाँ पढ सकते है।

Lightening is beneficial too. By Pankaj Oudhia

ज्ञानदत्त जी के ब्लाग में किसान से जुडी इस महत्वपूर्ण समस्या पर चर्चा का मुख्य उद्देश्य ब्लाग पर आने वाले प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना है। मुझे विश्वास है कि किसानों को आसमानी बिजली के कहर से बचाने के लिये कारगर उपायों पर आपके विचारो से हम किसी ठोस निष्क़र्ष तक जरुर पहुँच पायेंगे। वैसे पारम्परिक चिकित्सक कहते हैं कि किसानो से ज्यादा खतरनाक परिस्थितियो मे खराब मौसम के दौरान बन्दर रहते हैं। पानी से भीगे पेड़ों मे वे मजे से रहते है। क्या कभी बन्दरो को आसमानी बिजली से मरते देखा है या सुना है? बन्दरों के पास समाधान छुपा है। मुझे उनकी बात जँचती है। यहाँ सारा मानव जगत सर्दी से त्रस्त होता रहता है वहीं दूसरी ओर यह वैज्ञानिक सत्य है कि बन्दरो को सर्दी नही होती।

पंकज अवधिया

(इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया के पास है)


गर्मियों की तैयारी पर पंकज अवधिया



Pankaj A


श्री पंकज अवधिया ने पिछली साल पोस्ट लिखी थी – छत पर चूने की परत लगाने के विषय में। अपने उस प्रयोग पर आगे का अपडेट दे रहे हैं इस पोस्ट में। आप पायेंगे कि अनेक वनस्पतियां गर्मियों से राहत देने में प्रयोग की जा सकती हैं। आप पंकज जी के लेख पंकज अवधिया लेबल पर सर्च कर भी देख सकते हैं।

पिछली गर्मियो मे आपने छत मे चूने के प्रयोग के विषय मे पढा था। अब समय आ गया है कि इस विषय मे प्रगति के विषय मे मै आपको बताऊँ।

पिछले वर्ष गर्मियों में यह प्रयोग सफल रहा। पर बरसात मे पूरा चूना पानी के साथ घुलकर बह गया। शायद गोन्द की मात्रा कम हो गयी थी। इस बार फिर से चूना लगाने की तैयारियाँ जब शुरु हुयी तो एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ मित्र ने डरा दिया। आप जानते ही है कि मधुमेह की वैज्ञानिक रपट पर काम चल रहा है। 500 जीबी की आठ बाहरी हार्ड डिस्क कमरे मे रहती है जिनमे से दो कम्प्यूटर से जुडी रहती है। कमरे मे सैकडों डीवीडी भी हैं। एक हजार जीबी के आँकडो से भरे सामान को चूने के हवाले छोडने पर विशेषज्ञ मित्र ने नाराजगी दिखायी। कहा कि रायपुर की गर्मी मे हार्ड डिस्क और डीवीडी दोनो को खतरा है। मन मारकर एक एसी लेना पडा।

mahanadi मेरे कमरे मे एसी होने से काफी ठंडक हो जाती है पर एक मंजिला घर होने के कारण बाकी कमरे बहुत तपते हैं। रात तक धमक रहती है। इस बार नये-पुराने दोनो प्रयोग किये हैं। एक कमरे के ऊपर चूना लगाया है। दूसरे के ऊपर अरहर की फसल के अवशेष जिन्हे काडी कह देते हैं, को बिछाया है। तीसरे के ऊपर चितावर नामक स्थानीय जलीय वनस्पति को बिछाया है। चौथे कमरे मे वन तुलसा को बिछाया है।

वन तुलसा और चितावर दोनो के अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। चितावर का प्रयोग छत्तीसगढ मे आमतौर पर होता है। यह घर को ठंडा रखता है। जहाँ कही भी पानी भरा होता है चितावर अपने आप उग जाता है। लोग मुफ्त की इस वनस्पति को ले आते हैं और साल भर प्रयोग करते हैं। इस वनस्पति के औषधीय उपयोग तो हैं ही साथ ही औद्योगिक इकाईयो से निकलने वाले प्रदूषित जल के उपचार में भी इसका प्रयोग होता है।

वन तुलसा नामक वनस्पति बेकार जमीन मे उगती है खरपतवार के रुप में। छत्तीसगढ के किसानो ने देखा कि जहाँ यह वनस्पति उगती है वहाँ गाजर घास नही उगती है। यदि उग भी जाये तो पौधा जल्दी मर जाता है। माँ प्रकृति के इस प्रयोग से अभिभूत होकर वे अपने खेतों के आस-पास इस वनस्पति की सहायता से गाजर घास के फैलाव पर अंकुश लगाये हुये हैं। अरहर की जगह छत को ठण्डा रखने के लिये इसके प्रयोग का सुझाव किसानो ने ही दिया। उनका सुझाव था कि छत मे इसकी मोटी परत बिछाकर ऊपर से काली मिट्टी की एक परत लगा देने से घर ठंडा रहेगा। एक पशु पालक ने एस्बेस्टस की छत के नीचे रखी गयी गायों को गर्मी से बचाने के लिये कूलर की जगह इसी वनस्पति का प्रयोग किया है। आप चितावर और वन तुलसा के चित्र इन कडियो पर देख सकते है।

चितावर

वन तुलसा

मेरे गाँव के निवासी चितावर का प्रयोग करते रहे हैं। इस बार गाँव मे बन्दरों का अधिक उत्पात होने के कारण अब खपरैल वाले घरों मे टिन की छत लग रही है। टिन के नीचे दिन काटना कठिन है। वे टिन की छत पर चितावर की मोटी परत बिछा रहे है पर बन्दरो का उत्पात किये कराये पर पानी फेर रहा है। गाँव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी है कि सीताफल की कुछ शाखाए यदि चितावर के साथ मिला दी जायें तो बन्दर दूर रहेंगे। आपने शायद यह देखा होगा कि बन्दर सभी प्रकार की वनस्पतियो को नुकसान पहुँचाते हैं पर सीताफल से दूर रहते हैं। इस प्रयोग की प्रगति पर मै आगे लिखूंगा।

शायद यह मन का वहम हो पर इन दिनों जंगल मे धूप मे ज्यादा खडे रहना कम बर्दाश्त होता है। मुझे यह एसी का दुष्प्रभाव लगता है। इसमे माननीय बी.एस.पाबला साहब के सुपुत्र बडी मदद करने वाले हैं। उनकी सहायता से एक हजार जीबी के आँकडो को एक डेटाबेस के रुप मे आन-लाइन करने की योजना पर चर्चा हो रही है। जैसे ही यह आन-लाइन होगा सबसे पहले मै एसी से मुक्त होना चाहूँगा।

पंकज अवधिया

(इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।)


हमने इस साल, पंकज अवधिया जी के पिछली साल के लेख के अनुसार, अपने एक मंजिले मकान की छत पर चूने और फेवीकोल की परत लगाई है। उससे लगता है कि गर्मी कुछ कम है कमरों में।

पंकज जी की उक्त लेख में बताई वनस्पतियों की स्थानीय रूप से उपलब्धता में दिक्कत हो सकती है, पर अगर प्रयोग करने हों तो हर स्थान पर अनेक प्रकार की वनस्पति नजर आती है। यहां कुछ लोगों ने घर की छतों पर लौकी-नेनुआ की बेलें बिछा रखी हैं। वह भी तापक्रम कम करती होगी।   


चलो बुलावा आया है, जंगल ने बुलाया है!



Plants 1 "पास के जंगल मे चमकने वाले पौधे का पता चला है। आप जल्दी आ जाइये।" ज्यों ही बरसात का मौसम आरम्भ होता है प्रदेश भर से ऐसे फोन आने शुरु हो जाते हैं। फोन आते ही बिना विलम्ब किराये की गाडी लेकर उस स्थान पर पहुँचना होता है। कभी दो घंटे का सफर होता है तो कभी रात भर का। मैं दस से भी अधिक वर्षो से विचित्र मानी जाने वाली वनस्पतियों की तलाश मे इस तरह भाग-दौड कर रहा हूँ। ज्यादातर मामलो मे निराशा ही हाथ लगती है पर हर यात्रा से नया सीखने को मिलता है।

चमकने वाले पौधे का वर्णन रामायण मे मिलता है। पारम्परिक चिकित्सक भी इस वनस्पति की उपस्थिति का दावा करते रहते हैं। मैने अपने अनुभव से सीखा है कि यदि आप विशेषज्ञ बनकर इन पारम्परिक चिकित्सकों के पास जायेंगे तो आप को बहुत कम जानकारी मिलेगी। आप छात्र बनकर अपने ‘इगो’ को दरकिनार कर जायें तो वे आपको सहर्ष अपना लेंगे। भले ही शहरी मानव समाज मुझे विशेषज्ञ होने का दर्जा दे पर जब मैं जंगल मे पहुँचता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे स्कूल का पहला दिन है और सब कुछ नया है।

pankajयह पोस्ट श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है।

आप उनके पिछले लेख पंकज अवधिया पर लेबल सर्च कर देख सकते हैं।

पारम्परिक चिकित्सको से बात करते समय मै किसी तरह की प्रश्नावली तो दूर कागज का टुकडा रखना भी पसन्द नही करता हूँ। कागज देखकर वे सहम से जाते हैं। संभल के जवाब देते हैं। वानस्पतिक सर्वेक्षण के दौरान मै जो भी सुनता हूँ उसे उसके मूल रुप में लिख लेता हूँ। वे जो कहते हैं सहर्ष मान लेता हूँ। तर्कशील मन कहता है कि मै अपनी विशेषज्ञता झाड़ूं पर जैसे ही आपने यह किया, सूचनाओ का प्रवाह रुक जाता है। वैसे भी मै अपनी चन्द वर्षो की किताबी पढ़ाई को पीढ़ियों पुराने ज्ञान के सामने कम ही आँकता हूँ।

Plants 4 बरसात के आरम्भ होते ही जंगलों मे कई प्रकार के पारम्परिक चिकित्सक मिल जाते हैं। बरसाती रात मे आसमानी बिजली से झुलसे पेड़ों के विभिन्न भागों को एकत्र किया जाता है। बिजली गिरने के बाद जितनी जल्दी हो सके उस पेड़ तक पहुँचना होता है। फिर उपयोगी भाग को एक घोल मे सुरक्षित करना होता है। इन भागो का प्रयोग कम जीवनी शक्ति वाले रोगियो की चिकित्सा मे होता है। इस समय विभिन्न वनस्पतियों से वर्षा का जल एकत्र करते पारम्परिक चिकित्सक भी मिल जाते हैं। पहली वर्षा का जल औषधीय गुणों से परिपूर्ण माना जाता है। विभिन्न वनस्पतियों से जब यह बहकर आता है तो इसके गुणों मे और वृद्धि हो जाती है। जमीन पर गिरने से पहले इसे एकत्र कर लिया जाता है। रानी कीडा या भगवान की बुढिया के एकत्रण मे जुटे पारम्परिक चिकित्सक भी मिलेंगे। दलदली इलाकों मे नाना प्रकार के कन्दों से नव अंकुर निकलने का यही समय है। Plants 3

मै टाटा इंडिका (बहुत कम स्कार्पियो या इनोवा) का प्रयोग करता हूँ। घने जंगलों मे तो बरसात में गाडी से जाना सम्भव नही है। इसलिये पैदल चलना होता है। मै पेड़ पर चढने मे उतना माहिर नही हूँ इसलिये सुरक्षित जगहों पर ही जाता हूँ। वन्य प्राणियो से दूर रहना पसन्द करता हूँ। उनकी तस्वीरे लेने मे भी कम रुचि है। आमतौर पर साथ में पारम्परिक चिकित्सक और ड्रायवर ही होते हैं।

चमकने वाले पौधे नही मिलने की दशा मे यह कोशिश करता हूँ कि एक दिन में एक से डेढ हजार अच्छे छायाचित्र मिल जायें। पहले तो यह सम्भव नही था पर अब डिजिटल कैमरे के कारण बहुत सुविधा हो गयी है। कुछ वर्षो पहले मुझे एक रंगीन मशरुम मिल गया था घने जंगल में। मैने तस्वीरें उतारी और उसके बारे मे लिखा तो पता चला कि भारत मे इसे पहली बार देखा गया है। दस्तावेजों मे यह मेक्सिको तक ही सीमित था। पिछले वर्ष जंगल में अजगर परिवार से मुलाकात हो गयी। कुछ उपयोगी कीट भी मिल गये।

आने वाले कुछ महीनों मे इन दौरो के कारण व्यस्तता बढ़ेगी और आप मुझे ज्ञान जी के ब्लाग पर नही पढ़ पायेंगे। नये अनुभव के साथ मै दिसम्बर से फिर आपसे मिल सकूंगा। आप दुआ करें कि इस बार चमकने वाला पौधा मिल जाये ताकि देश के बिजली संकट को कुछ हद तक ही सही पर कम किया जा सके।Happy

विभिन्न वनस्पतियो से एकत्र किये गये पहली वर्षा के जल के पारम्परिक उपयोग।

आसमानी बिजली उपयोगी भी है

पंकज अवधिया

© सर्वाधिकार पंकज अवधिया।


ऊपर वनस्पतीय चित्र मेरे बगीचे के हैं। वर्षा में आये नये पत्तों से युक्त पौधे। इनमें कोई चमकने वाली वनस्पति तो नहीं, पर रात में इनपर यदा-कदा जुगुनू उड़ते पाये जाते हैं। Waiting

कल हमने समय से पहले सॉफ्टपेडिया के यहां से फॉयर फॉक्स ३ डाउनलोड कर इन्स्टाल कर लिया था पर इस आशंका में थे कि यह कुछ पहले का वर्जन न हो। लिहाजा, आज यहां से फिर डाउनलोड किया, चीज वही निकली। खैर दुबारा कर उन लोगों को गिनीज में नाम दर्ज कराने को टेका लगा दिया!
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